गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

मित्र का अधिकार

मेरे साथी प्रोफ़ेसर इस बात से बड़े परेशान थे कि बिना उपयोग करने पर भी बिल क्यों देना पड़ता है. ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि जो जितना वाशिंग मशीन का उपयोग करे उतना बिल दे. मैंने कहा मैं तो पिछले छः माह से इस अपार्टमेंट में रहता हूँ. मैंने कभी अपने कपडे वहां नहीं धोये. मेरे फ्लेट में मुझसे पहले रहने वाला सज्जन व्यक्ति वाशिंग मशीन छोड़ गया था. मैं उसी का उपयोग करता हूँ. मुझे तो यह भी नहीं पता कि वाशिंग मशीनें आखिर हैं कहाँ? कभी ऐसा सोचा ही नहीं कि बिल आता किस प्रकार है. अपनी अज्ञानता पर मुझे कमतरी का अहसास हुआ. खैर एक दिन मालूम हो गया कि मेरे साथी ने अपने हिस्से के बिजली-पानी के बिल का प्रबंध किस तरह कर लिया था. हुआ यह कि एक दिन जब मैं कक्षा लेकर आ रहा था तो दूर से दिखाई पड़ा कि मित्र तेज़ी से एक गैलरी में चले जा रहे हैं. मुझे जिज्ञासा हुई कि आखिर ये उधर जल्दी-जल्दी क्यों जा रहे हैं? उधर तो किसी का अपार्टमेंट भी नहीं है. मैं खुद कभी उस तरफ नहीं गया था. विस्तार से जानने की जिज्ञासा हुई और यह भी कि मित्र को इतनी जल्दी उधर दिखाई क्या दे गया. अतः थोड़ी देर रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगा. बहुत देर नहीं हुई. लगभग दो मिनट में ही मित्र उधर से लौट आये. लेकिन गए खली हाथ थे और आते समय भरे हाथ. दरअसल उनके हाथ में एक छोटा-सा टब था. मैंने ध्यान से देखा कि उस टब मैं एक बनियान, दो कच्छे, एक रूमाल और एक तौलिया था. मैंने पूछा कि आप ये इतनी महत्वपूर्ण सामग्री कहाँ से ला रहे हैं? कहने लगे कि वाशिंग मशीन में कपड़े धोकर ला रहा हूँ. मैंने कहा कपड़े? हालाँकि थे वे कपड़े ही, पर मेरा दिल उनको उस रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि पांच कपड़ों को भी वाशिंग मशीन के हवाले कर दिया जाए. मैंने कहा कहाँ रखी गयी हैं वाशिंग मशीनें? और सुना था ड्रायर भी हैं अलग से. कहने लगे आपसे पूछता तो आप तो बताते नहीं. मैंने अपनी पडौसी एक चीनी महिला को परसों कपड़े धोकर लाते हुए देखा था. उससे ही पूछ लिया. बहुत सज्जन थी. मुझको ले जाकर उसने वह जगह दिखाई जहाँ वाशिंग मशीनें और ड्रायर रखे हुए हैं. उन पर सभी निर्देश क्योंकि कोरिया भाषा में हैं, चीनी महिला ने मुझे संकेतों में समझाने की कोशिश तो की लेकिन मैं समझ नहीं पाया. फिर भी अनुमान से आज पहले प्रयोग के तौर पर अपने कपड़े वाशिंग मशीन में धो लाया. मैंने कहा कि अनुमान से क्या अभिप्राय? कहने लगे कि साबुन, लिक्विड या पाउडर डालने के तीन कॉलम बने हैं. मेरे पास पाउडर या लिक्विड तो था नहीं, किसी का पाउडर वहां रखा हुआ था, मैंने अनुमान से एक तरफ उसी में से लेकर थोड़ा-सा पाउडर डाल दिया और मशीन चला दी. समय अवश्य अधिक लगा, पर कपड़े अच्छी तरह धुल गए. मैंने समय के बारे में पूछा तो मित्र ने बताया कि कुल दो घंटे लगे. मेरी रूचि वाशिंग मशीन में तो नहीं थी पर उस जगह को देखने में अवश्य थी, जहाँ ये उपकरण लगे हुए थे. सोचा कि मित्र की खोज है देख लूं. संभव है कभी ज़रुरत पड़ जाए. जब गया तो देखा कि सचमुच वहां पांच अत्याधुनिक वाशिंग मशीनें और दो अच्छे ड्रायर रखे हुए थे. सब का आकर बहुत बड़ा था. कमसे कम दस किलो कपड़े एक साथ धोये जा सकते थे. मैंने उस मशीन को भी देखा जिसमें मित्रे अपने कच्छे-बनियान धोकर लाये थे. उस मशीन का साबुन डालने वाला हिस्सा खोलकर देखा तो विचित्र किन्तु सत्य जैसी स्थिति हो गयी. यानी मित्र ने पडौसी के पाउडर से निकालकर जितना उस मशीन में डाला था, सब सुरक्षित था. हाँ साथी के कपडे ज़रूर धुल गए थे. मैंने साथी की ओर देखा तो मुस्कराने लगे. बोले कि चलो अनुभव तो हुआ और कपडे भी धुल गए. धीरे-धीरे और भी सीख जाऊँगा. अपने हिस्से के बिजली पानी का उपयोग तो कर ही लूँगा जो मेरा अधिकार है. पता चला कि आजकल अधिकार के लिए सप्ताह में तीन या चार बार कपड़े धोकर ला रहे हैं. बार-बार दौड़ भाग करते हैं अलग से. धन्य है अधिकार की मादकता का सुख. 

बुधवार, 24 जनवरी 2018

अथ बिल्ली कथा

कुछ लोग कुत्ता न पालकर बिल्ली पालते हैं. एक बार में अपने मित्र के रिश्तेदार के घर गया जिनके यहाँ एक बिल्ली सकुटुम्ब रहती थी. गिन तो मैं नहीं सका लेकिन मेरा अनुमान है कि कुलमिलाकर पूरा कुनबा छ-सात का तो रहा होगा. हमारे जाने से और बार-बार बिल्लियों के दस्तक देने से घर के मालिक असहज महसूस कर रहे थे. मैं बिल्लियों के कारण असहज अनुभव कर रहा था. मेरे मित्र हम दोनों के की असहजता के कारण असहज हो रहे थे. निष्कर्षतः सब असहज थे केवल घर की मालकिन के यानी दोस्त के मित्र की पत्नी के,  जिनके कारण बिल्लियाँ घर में अबतक थीं. दोस्त के मित्र का नाम कबीर था जिनकी उम्र लगभग 55 वर्ष के आसपास रही होगी. वापस लौटते समय मित्र ने रास्ते में बताया कि कबीर साहब किसी समय भयंकर बिल्ली विरोधी थे. लेकिन इनकी पत्नी को न जाने कहाँ से प्रेरणा मिली कि ये अपने मायके से एक बिल्ली ले आयीं. वस्तुतः यह शादी का किंचित विलंब से ही सही पर सही समय पर उत्पन्न हुआ ‘आफ्टर इफेक्ट’ था. कारण यह था कि जब कई साल के बाद भी घर में कोई संतान न हुई तो मित्र की घरवाली ने प्राणी-पालन में मन लगाया. मित्र आखिर कैसे, क्यों और कब तक विरोध करते. अंततः पत्नी की बेरहम इच्छा के आगे उनको समझौता करना पड़ा. पत्नी पर तो उनका कोई दबाब न चला, पर अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने ऊपर तो दबाब कम से कम बना ही सकते थे. सो उन्होंने बना लिया. इतना कहकर दोस्त चुप हो गया. शायद आगे वाकया या तो उसको पता नहीं था या मैं उसको सुनाने के लिए उपयुक्त पात्र नहीं था. अतः मैंने भी न पूछा. लेकिन दोस्त द्वारा मिली इस जानकारी से मेरे अंदर एक जिज्ञासा बलवती हो गयी कि यदि संभव हो पाए तो दोस्त के मित्र से एक बार और मिला जाय. शीघ्र ही संभावना बनी तो मुलाक़ात हो ही गयी. बात-बात में पता चला कि बिल्ली-चर्चा दोस्त की दुखती रग है. लेकिन इससे क्या? अगर रग है और दुखती रग है तो उसे और दुखाने में हरज ही क्या है? यही दस्तूर भी है. किसी ने कहा भी है कि कुछ खास जानना हो या किसी को चिढाना हो तो उसकी दुखती रग पर हाथ रख दो. अतः मैंने ईमानदारी से अधिक जानने के लिए ही राग को छू दिया. जानने पर प्रस्तुत जानकारी मिली जिसमें मित्र के ज्ञान की छाप मौजूद थी. आप भी सुनिए- अनेक कमियां गिनाने के बात अचानक कुछ यद् आ जाने पर कबीर साहब ने अपनी सबसे ज़िम्मेदार बिल्ली को बुलाया. उन्होंने धीरे से उसके कान में न जाने क्या कहा कि वह बोलने लगी. अविश्वसनीय पर उस बोलती बिल्ली ने दुनिया की सभी बिल्लियों का प्रतिनिधित्व करते हुए बताया कि बिल्ली की अनेक विशेषताएँ हैं। सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि बिल्ली का सबसे पारिवारिक संबंध हैं। वह रिश्ता इतना मजबूती का है कि वह सबकी मौसी है। चाहे उसका कोई राजा हो या न हो, लेकिन फिर भी बिल्ली बिन राजा की रानी है, भले ही चाहे वह खूब सयानी ही क्यों न हो? बिल्ली इतनी लोकप्रिय है कि बिल्ली के नाम पर कैटवॉक होता है जिसको मशहूर मॉडेल्स सम्पन्न करते हैं। यानी अपनी चाल से भी बिल्ली अनुकरणीय है। बिल्ली की आँखें बहुत मार्के की होती हैं इसलिए बिल्ली के नाम पर कैटस आई रखा गया है जिसकी विशेषता है कि वह रात में भी चमकती हैं। बिल्ली प्राणियों में सबसे स्मार्ट होती है और इसीलिए किसी को यदि स्मार्ट कहना हो तो हम कहते हैं, बड़े कैट हो रहे हो? क्या बात है? हाय कैट। बिल्ली ने चूहों की बड़ी-बड़ी समस्यायेँ सुलझाई हैं। उनमें से सबसे बड़ी समस्या चूहों के लिए यह थी कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा, इसका समाधान भी आखिर में बिल्ली ने ही निकाला और आसानी से अपना गला चूहों के सामने कर दिया कि ये लो मेरे प्यारे दोस्तो, ये लो मेरा गला और निडर होकर बांधो मेरे गले में घंटी। मैं कुछ भी नहीं करूंगी. चुपचाप अपने गले में आपकी घंटी बंधवा लूंगी. भले ही मुझे चाहे जो तकलीफ़ क्यों न हो. मैं चाहती हूँ कि जब भी मैं इधर से गुज़रूँ, तो मेरे आने का तुमको पहले से ही पता चल जाय। तुम मानसिक रूप से तैयार हो जाओ। हो सकता है कि अपने बचाव की तैयारी करो और इधर-उधर भागो। इससे तुम्हारा स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। मैं तो फिर भी किसी तरह अपना काम चला ही लूँगी, लेकिन तुम्हारे स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी तो मेरी भी बनती ही है। आखिर पीढ़ियों से हमारा आपसी संबंध है। इस पुराने संबंध का निर्वाह मैं हर कीमत पर करूंगी। मेरे ही बारे में अक्सर कहा जाता है कि चूहों की रखवाली बिल्ली, अब उन मूर्खों को कौन बताए कि मैं नहीं तो और कौन आपकी रखवाली करेगा? मैं तुमको अच्छी तरह जानती हूँ, तुम्हारी नस-नस पहचानती हूँ, खून की तो बात क्या हड्डी तक का हाल जानती हूँ। मुझसे अधिक तुम्हें कौन जानता है। मैंने चाहे जितने भी चूहे खाये हों, पर ज़रा बताना कि ऐसा काम करने के बाद भी मेरे अलावा कोई और धार्मिक-यात्रा करने गया था। मैं ही तुमसब के कल्याण के लिए अनेक कष्ट सहन करते हुए तीर्थयात्रा पर गयी। कुत्ते को देखो। कभी तुमने सुना है उसके बारे में। सब बुराई करते हैं। कहते हैं, चल कुत्ते, आया है कुत्ता कहीं का। लोगों ने तो उसके साथ यह तक किया कि धोखा देकर  उसकी जात भी पता कर ली. क्या आवश्यकता थी इसकी. क्या मिला लोगों को कुत्ते की जाति पता करके. बेचारे को धोखा देकर केवल और वह भी दो पैसे की खली केवल हँडिया देकर उसकी जात भी पहचान ली गयी। ऐसी गोपनीय बात जिसको वह पीढ़ियों से अपने अन्दर छिपाए हुए था, लोगों ने उसको इतने सस्ते में जान लिया. धोखा किया सरासर उसके साथ. लेकिन फिर भी वह वफादारी करता है. मूर्ख जो ठहरा. मेरी तरह चालाक नहीं है. बेचारा धोबी के घर भी गया तो वहां भी, न घर का रहा न घाट का। कितना वफादार होता है फिर भी दुत्कारा जाता है। मुझे देखो, मेरे बारे में ऐसी कोई बात नहीं है। मेरी वफादारी का न तो कोई उदाहरण दिया जाता है, न ही मेरा मज़ाक उड़ाया जाता है। हाँ, केवल धार्मिक मामलों में ही मुझे टोंट मारा गया था, पर मैंने उसके बाद अबतक बहुत ध्यान रखा है। मैं अब उन ममलों से दूर रहती हूँ. पूर्णत: शाकाहारी हो गयी हूँ। अहिंसावादी हूँ और सबसे बड़ी बात यह है कि मैं प्रेम की पुजारन हूँ। बिल्ले के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती, क्योकि इस भद्र समाज ने जो मूलतः पुरुष प्रधान है, सब बातें केवल मुझे कष्ट पहुँचाने लिए ही कही हैं और मेरे बारे में हकीक़त से परे जाकर मनमानी झूटी-सच्ची कहानियाँ बनाई हैं। यदि ऐसा नहीं है तो क्यों नहीं कभी किसी ने घंटी जैसी खतरनाक और भारी वस्तू बिल्ले के गले में बांधने का सुझाव दिया. आजतक मैंने नहीं सुना कि किसी ने बिल्ला, कुत्ता या भेड़िया के गले में घंटी बाँधने की हिम्मत की हो? यहाँ तक कि शेर के भी नहीं जो कि हमारा ही पूर्वज है. हमें बताया गया है और हम भी ऐसा मानते हैं कि हम उसकी प्रजाति के हैं. इसीलिए हम उसका बहुत आदर करते हैं. तुम तो मुझे यह भी बताओ कि क्यों नहीं बिल्ला कभी हज जैसी पवित्र यात्रा पर गया। उससे तो कोई शिकायत नहीं, फिर मुझसे ही क्यों? मैं तो आखिर गयी भी और ताना भी आजतक मुझे ही मारा जाता है. ये सब बातें स्वयं बिल्ली से सुनकर मैं उनको आपको बताने चल दिया. .......

सोमवार, 12 जून 2017

हफ्स और हबीब

कोरिया प्रवास के दौरान जब मैं सुबह-शाम खेल के मैदान में घूमने गया तो एक दिन वहां अफगानी जैसा दिखने वाला व्यक्ति घूमते हुए दिखाई दिया. मेरा ध्यान उस आदमी पर इसलिए गया कि मुझे वह जिज्ञासा से घूर रहा था. यहाँ तक कि घूमते-घूमते मुझे ध्यान से देखने के लिए ही बीच-बीच में थोडा रुक भी जाता. फील्ड चौकोर था और घूमने का ट्रैक गोलाकार. अतः फील्ड के कोनों में उसे रुकने का बहाना भी मिल जाता. जब घूमता-घूमता मैं उसके बराबर से निकलता, वह बिलकुल अनजान-सा होकर मेरी तरफ कनखियों से देखता. फिर तेज़ी से कदम रखता हुआ मेरे बराबर से आगे निकलने का प्रयास करता, कुछ इस तरह कि मुझे उसकी गतिविधि पर किसी प्रकार का कोई शक भी न हो. शक करने का हालांकि कोई कारण भी नहीं बनता था क्योंकि ऐसा अनेक बार होता था जब घूमते-घूमते कई लोग इस तरह रुक-रुक कर टहला करते थे और इस प्रक्रिया में कभी आगे निकल जाते तो कभी पीछे छूट जाते. पर मैंने धीरे-धीरे महसूस किया कि वह लड़का जैसे मेरे आस-पास ही रहने का प्रयास कर रहा था. वरना रुकने के बाद जैसे ही मैं उसके पास से आगे जा रहा होता था वह अपनी कनखियों से मुझे ही क्यों घूरता हुआ लगता. कई वार तो ऐसा भी हुआ कि जैसे ही मैं चलते-चलते उसके बराबर से गुज़रा तो वह मेरे आगे निकलते ही पुनः चल दिया. पहले तो मैंने उसपर कोई ध्यान न दिया, क्योंकि न तो मैं उसे जानता था और किसी भी कारण से न ही मेरे पास उसपर या उसकी गतिविधियों पर शक करने का कोई आधार था. सच पूछा जाय तो उसकी कोई आवश्यकता थी भी नहीं थी. रोज़ लोग टहलते ही रहते थे. मैं उस दिन कुछ ज़यादा देर फील्ड में रहा गया. लगभग एक घंटे तक. जब मैं टहलने के बाद अपने अपार्टमेंट की ओर जाने लगा तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह लड़का वहीं एक बेंच पर बैठा हुआ था, जो सुस्ताने के लिए ग्राउंड में दोनों ओर रखी हुई थीं. वह लगातार मुझे इस तरह देख रहा था जैसे कि पहचानने का प्रयास कर रहा हो. लड़का देखने में बहुत गोरा था और उसके चेहरे पर बहुत हल्की-सी दाढ़ी थी. चेहरा गोलाकार था और कद बहुत लंबा नहीं था. वह अनौपचारिक पोशाक में था पर वह स्पोर्ट्स ड्रेस नहीं थी. हाँ, स्पोर्ट्स के ब्रांडेड जूते अवश्य पहने हुए था. उसकी ड्रेस से वह देखने में किसी अच्छे परिवार का लगता था. बातचीत हुई नहीं थी, इसलिए यह कह पाना कठिन था कि वह पढ़ा-लिखा कितना है. इन सब जिज्ञासाओं के बीच मैंने उसके साथ बातचीत करके उसके बारे में जानने का मन बनाया. और उसके निकट गया तो उसने स्वयं ही मुझसे बात करने की पहल की। उसने अपना नाम हबीब बताया और यह भी कि वह पाकिस्तान का रहने वाला है। मैंने अपना परिचय दिया और साथ में अपना विजिटिंग कार्ड भी, जो इत्तफाक से उस समय मेरे पर्स में था. उस लड़के को देखकर लग रहा था कि वह कहीं कड़ी मेहनत वाली नौकरी करता होगा. मैंने देखा कि वह मेरे विजिटिंग कार्ड को बड़े ध्यान से पढ़ रहा था और पढ़ते-पढ़ते उसके चहरे का रंग भी तेज़ी से बदलता जा रहा था. यह कुछ क्षणों के अंतराल में ही हुआ होगा कि वह तुरंत ही व्यवस्थित होकर मुस्कराया और बोला कि ‘ओह, तो आप हिंदुस्तान से हैं. मैंने समझा था कि आप पाकिस्तान से हैं.’ खैर, चलिये, आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई। मुझे उसकी प्रतिक्रिया जानकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. उसके पहले भी न जाने क्यों, कई लोग इसी प्रकार मुझे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ब्राजील, नेपाल, स्पेन आदि का समझने की भूल कर चुके थे. मुझे अपना अंतर्राष्ट्रीयकरण किये जाने पर अच्छा भी लगता था और आश्चर्य भी होता था. उस पाकिस्तानी व्यक्ति ने भी ऐसा ही कुछ सोचा होगा जैसा मैंने उसके अफगानी होने के बारे में सोचा था। हम दोनों ही गलत निकले। लेकिन फर्क केवल यह था कि मुझे उसके अफगानी न होने पर कोई दुख या आश्चर्य नहीं हुआ जबकि उसको मेरे पाकिस्तानी न होने पर कुछ ऐसा हुआ जो उसके चहरे के भावों से पता चलता था पर वह बता नहीं रहा था। खैर, जब उसने मुझसे कहा कि आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई तो मैंने मज़ाक में कहा कि सचमुच खुशी हुई या सिर्फ कहने के लिए?’ इस पर वह बहुत ज़ोर से हंसा और बोला कि आप जो समझें

सामान्य परिचय के बाद शिष्टाचारवश मैंने उसे चाय ऑफर की। किंचित संकोच के बाद वह तैयार हो गया, लेकिन मेरे अपार्टमेंट में नहीं, विश्वविद्यालय कैंटीन में। कमरे चलने में वह हिचक रहा था। मैंने भी बहुत आग्रह नहीं किया। पहली बार मिल रहा था तो मुझे भी बहुत आग्रह करने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई। वैसे भी मेरे लिए वो और उसके लिए लिए मैं आपस में अजनबी ही थे। उसको मैंने विश्वविद्यालय के कैंटीन में ले जाकर चाय पिलाई और बातचीत की। मैंने यह भी पूछा कि वह मुझसे क्यों मिलना चाहता है? जसने अजीब-सी बात बताई। बोला कि 'मैं  यहाँ किसी पाकिस्तानी से मिलना चाहता था। पता चला था कि एक पाकिस्तानी अध्यापक इस विश्वविद्यालय में रिसर्च के लिए आए हैं। मैं उनको और उनके बारे में कुछ नहीं जानता। बस सुना ही है। आपको देखा तो ऐसा लगा कि आप पाकिस्तान से हैं। मैंने पूछा कि मुझे देखकर आपको कैसे लगा कि मैं पाकिस्तानी हूँ. क्या खास है मेरे चेहरे में?’ वह चुप रहा। फिर मैंने दोबारा पूछा तो बोला कि आपका चेहरा पाकिस्तानी इसलिए लगता है कि आप दाढ़ी और मूंछ रखते हैं। इस देश में ज़्यादातर पाकिस्तानी मूंछ रखते हैं और हिंदुस्तानी नहीं रखते हैं। मुझे उसकी बात में थोड़ी-थोड़ी सच्चाई लगी। क्योंकि कुछ कोरेयाई विद्यार्थी भी मुझसे पूछते थे कि मैं पाकिस्तानी हूँ या हिंदुस्तानी? इसका कारण संभवतः मूंछ ही रहा होगा। कैसी अजीब बात है? खैर, उस पाकिस्तानी के प्रति मेरे मन में रूचि बढ़ने लगी। वह बातें बहुत शानदार करता था। उसको हिन्दी नहीं आती थी। उर्दू भी नहीं आती थी। केवल ऐसी भाषा बोल रहा था जो पंजाबी जैसी थी. हालांकि वह स्वात का रहने वाला था। उसी ने मुझे बताया कि स्वात बहुत सुंदर जगह है। मौसम बहुत अच्छा है और प्रायः ठंड रहती है। उसने तो यहाँ तक कहा कि स्वात आपके कश्मीर से भी अधिक सुंदर है। उसके मुंह से ऐसा सुनकर अजीब-सा लगा. हम तो कश्मीर को स्वर्ग कहते हैं, पर हबीब? मैंने मजाक में उससे यूं ही कहा कि हिन्दुस्तानी ही क्यों ज़यादर पाकिस्तानी भी विदेशों मूंछ नहीं रखते हैं. उस लड़के के चेहरे पर भी मूंछें नहीं थीं. हम मूंछ नहीं तो मूंछ की बात अवश्य रखते हैं. वह जोर से हंसा और बोला आप अच्छी बातें करते हैं. थोड़ी ही देर में हबीब से ढेर साड़ी बातें हो गयीं. पता चला कि उसकी जिंदगी बहुत व्यस्त है। वह अधिक पढ़ा लिखा नहीं है। उसको अंग्रेजी भी ठीक से नहीं आती है। शब्दों का उच्चारण बहुत खराब करता है। अशुद्ध भी बोलता है। वाक्य सही से नहीं बना पाता। फिर भी वह कई साल से कोरिया में रहता है और किसी प्राइवेट कंपनी में काम करता है। हबीब ने यह भी बताया कि वह विवाहित है और उसकी पत्नी कोरियाई है। आगे बातचीत के दौरान यह भी मालूम हुआ कि उसकी पत्नी डॉक्टर है और एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत है। उसने मुझे अपने घर बुलाने के लिए कहा और यह भी कि यदि कोरिया में कहीं कोई काम पड़े तो वह मदद करेगा. वह कोरियाई बहुत अच्छी बोल लेता था. बीच में किसी से फोन पर बात करते हुए उसको सुना. मैंने हबीब को धन्यवाद कहा और उसे बाहर तक छोड़ आया। वह चला गया तथा पुनः आने के लिए भी कह गया। हबीब अगले दो-तीन दिन नहीं आया। अब मुझे उससे मिलने की इच्छा होने लगी। मैंने उसको फोन किया। लेकिन वह फोन पर नहीं मिला। फोन शायद बंद था। कोरेयाई भाषा में कोई संदेश आ रहा था। मैं कोरेयाई संदेश नहीं समझ सका। फोन करने के दो दिन बाद हबीब का फोन आया। बोला कि दूसरे शहर में किसी काम के सिलसिले में गया था। उसने मेरे पास मिलने आने के लिए कहा. अगले दिन हफ़्स में आया। लेकिन मेरे टहलने के बाद। मैंने पूछा कि तुम नियमित नहीं टहलते हो। हबीब बोला कि बिलकुल नहीं। कभी-कभी समय मिलने पर ही टहल पाता हूँ. नौकरी के बाद समय ही कहाँ  मिलता है कि टहलूं भी........आगे ....

बुधवार, 31 मई 2017

मित्र पुराण 2

कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है कि जिस पर चाहकर भी आपका वश नहीं रहता। ऐसा ही मेरे और मेरे मित्र के बीच हुआ। दक्षिण कोरिया के सिओल स्थित हंकुक विदेश अध्ययन विश्वविद्यालय में अध्यापन हेतु कार्यरत समस्त प्राध्यापकों और गैर शिक्षक कर्मचारियों को विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा विजिटिंग कार्ड छपवाकर दिए जाते हैं. सभी कार्ड्स का रंग बिलकुल एक समान होता है. जैसा प्रायः होता है कि पहली बार मिलते समय विजिटिंग कार्ड देने की परंपरा है। इसलिए जब लोग आपस में मिलते हैं तो विजिटिंग कार्ड्स का आदान-प्रदान होता है। यहाँ हमारे जैसे विदेशी प्राध्यापकों के पास कार्ड तो बहुतायत में होते हैं अपने देश की अपेक्षा मिलने वाले कम, अब कार्ड के लिए समस्या है कि वह जाये कहाँ? मेरे एक सहकर्मी साथी की यही पीड़ा थी। अपना सुन्दर-सा विजिटिंग कार्ड वो दे किसे? एक दिन उसने अपनी वह पीड़ा मुझे बताई और कहा कि ‘देखिये इतने सारे विजिटिंग कार्ड्स हैं। अब हमारे लिए इनका क्या उपयोग है? भारत जाएंगे तो वहाँ भी किसको दें? मेरे लिए सब बेकार हैं।’ मुझे उनका कष्ट देखकर अच्छा नहीं लगा। सोचा कि एक राय दे दूँ और राय होती भी देने के लिए है। राय के साथ एक और महत्वपूर्ण बात जुड़ी है कि भारत में उसे बिन मांगे देने की परंपरा है। अतः परंपरा का निर्वाह करते हुए मैंने अपनी राय मित्र को दे दी। राय देने का परिणाम क्या हुआ और मित्र ने किस तरह उस बिन मांगी राय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, वह बाद में। पहले राय सुनिए। मैंने कहा कि आप प्रातः जब घर से निकलते हैं तो सबसे पहले अपनी जेब में पर्स या रुपये रखने से भी पहले दस-बीस विजिटिंग कार्ड रख लिया कीजिए। रास्ते में जो भी मिले उसे एक थमा दीजिये। विश्वविद्यालय के सभी विभागों में जाइए और कार्ड का आदान-प्रदान कीजिये। एक ही दुकान से सामान मत खरीदिए। अलग-अलग दुकानों पर जाइए। सबको अपना कार्ड दे दीजिये। क्योंकि मैं पहले से कार्यरत था तो वहाँ की अपनी वरिष्ठता का सम्मान करते हुए उनको बताया कि कोरिया में यदि दुकानदार को बताएं कि आप प्रोफेसर हैं तो बहुत सम्मान करते हैं और कभी-कभी सामान खरीदने पर कुछ छूट भी दे देते हैं। भारत मैं तो ऐसा है नहीं, इसलिए अपने पद के महत्व का आनंद लीजिये। कोई काम न हो तब भी बस या सबवे में कार्ड के लिए ही सही, कभी-कभी यात्रा कीजिये और साथ बैठे व्यक्ति को मुस्कराहट के साथ अपना कार्ड थमा दीजिये।‘ बाकी सुझाव तो मित्र को अच्छे लगे, पर व्यर्थ बस या सबवे की यात्रा का विचार पसंद नहीं आया। कहने लगे कि ‘केवल कार्ड बांटने के लिए मैं बस और सबवे में टिकट के पैसे क्यों खर्च करूँ। आप क्यों नहीं अपने साथ मेरे भी कुछ विजिटिंग कार्ड रख लेते? जहां अपने दें मेरे भी दे दें।‘ मुझे उनकी बात अच्छी लगी पर मज़ाक में गलती से उनसे वह कह गया जो नहीं कहना चाहिए था। कहा कि ‘मैं ऐसा करता हूँ कि कल और परसों मेरी कक्षा नहीं है, अतः नाश्ते के बाद सबवे स्टेशन पर आपके कार्ड लेकर चला जाता हूँ और जहां विज्ञापन करने वाले खड़े रहते हैं वहीं उनकी बगल में खड़े होकर आपके सभी कार्ड दो दिनों में बाँट देता हूँ। समस्या समाप्त।‘ अब राय देने का परिणाम और प्रतिक्रिया सुनिए।  कहते हैं कि कमान से निकला तीर और ज़ुबान से निकली बात कभी वापस नहीं आती। पर ऐसा हुआ नहीं। तीर भी वापस आया और बात भी। तीर नज़रों से वापस आया क्योंकि मित्र ने बहुत ही खतरनाक दिखने वाली निगाहों से मुझे घूरा और मुंह से निकली मेरी बात मित्र के मुखारविंद से और भी अधिक फलीभूत होकर वापस आयी। गुस्से से भरकर इतना तेज़ मुंह खोला कि उसके बाद कई दिनों तक उनको मेरे साथ खाना खाने के लिए मुंह खोलने की आवश्यकता नहीं हुई। अपने बनाए कोपभवन में ही चले गए। बोनस में दो-तीन सप्ताह बात तक नहीं की, वह अलग से। यहाँ तक कि नाश्ते पर साथ जाने का समय भी बदल लिया।

मित्र पुराण

जो जगह मित्र ने मिलने के लिए बताई थी, मैं नियत समय उस जगह पहुंच गया पर मित्र वहाँ दिखाई न दिये। मैं कई बार इधर-उधर नज़र दौड़ायी पर मित्र के दर्शन न हुए। बहुर सर्दी पद रही थी। रात में काफी बर्फ भी पड़ चुकी थी। ठंड इतनी थी कि ठंड के मारे न केवल हाथ ठिठुर रहे थे बल्कि पैरों की अंगुलियाँ भी लगभग सुन्न हो रही थीं। मित्र से मिलने के इंतज़ार में यह सब हो रहा था वरना वातानुकूलित संकाय भवन में अंदर जाकर गर्मी का आनंद लेता। तभी मेरी नज़र एक थमलानुमा मोटी-सी चीज़ पर गयी जो लगभग उतने ही मोटे हाथ से मुझे कुछ संकेत जैसा करने का प्रयास कर रही थी, हालांकि थमलानुमा चीज़ का वह भारी हाथ वजनदार कपड़ों और कपड़ों के टाइट होने के कारण ठीक तरह से उठ नहीं पा रहा था। फिर भी थमला काफी टेढ़ा होकर मुझे अपनी ओर बुलाने का प्रयास कर रहा था। मैंने पहले भी उस थमलानुमा चीज़ को देखा था, लेकिन तब उसमें कुछ हलचल न थी। रही भी हो तो मैंने ध्यान न दिया होगा। अब अपरिचित वस्तु थी तो मुझे क्यों उसमें रुचि हो सकती थी भला? वैसे भी पूरा मुंह मफ़लर से ढका हुआ था। सिर पर भारी-सी टोपी थी और उस टोपी पर भी उनके ओवरकोट की कैप। चश्मा अलग से लगा रखा था। मैं तो अपने मित्र से मिलने गया था, उन्हीं मित्र से जिनका सुबह-सुबह फोन आया था और उन्होंने उसी जगह मिलने के लिए मुझे बुलाया था जहां मैं उनकी तलाश कर रहा था। तलाश कर रहा था मित्र की और मिला थमला। कैसे पहचानता? मित्र असल में काफी दूर रहते थे, यानी मेरे घर से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर। यह जगह जहां मिलना तय हुआ था, मेरे घर के बिलकुल समीप थी। मित्र ने यही बड़ी कृपा की थी कि मुझे बुलाने के वजाय स्वयं मिलने आ गये थे। खैर, उस बेहद सर्दी भरे दिन के मौसम में इशारा अनदेखा करना उचित न था। अतः उस वस्तु के पास गया। वस्तु भी धीरे-धीरे खिसकती हुई मेरे समीप आने का प्रयास करने लगी। अभी थोड़ी देर पहले ही बस उसको उतारकर गयी थी। लेकिन मुझे क्या पता था कि मित्र ही रूप बदल कर आए हैं। जब बहुत निकट पहुँच गया तो उनको पहचान पाया। कद तो छोटा था ही। भारी कपड़ों के कारण और भी छोटा हो गया लगता था। ठंड से बचने के लिए एहतियातन उन्होंने अपने शरीर के अनुपात से बहुत ज़्यादा कपड़े पहन रखे थे। बिना किंचित देर किए मित्र ने शिकायत की कि दो बार इधर से निकल गए और मुझे पहचाना तक नहीं । मैं हाथ से इशारा भी कर रहा था। मैं कुछ नहीं बोला। केवल उनको देखकर मुस्कराया। मुझे मुस्कराता देख वे भी मुस्कराइए। प्रेम से अपना भारी हाथ मिलाने के लिए वस्त्रों से बाहर निकालने का प्रयास किया पर ठंड के डर से कहिए या कपड़ों के प्रभाव से, वह हाथ बाहर न निकला। दरअसल ठंड से बचने के लिए बहुत ही भारी और मोटे चमड़े के बने दस्ताने मित्र ने हाथों में पहन रखे थे। मैंने दस्ताने की अंगुली या अंगूठा जो भी मिला उसको ही ऊपर से स्पर्श करके हाथ मिलाने की रस्म निभाई। हम धीरे-धीरे चलते हुए प्राध्यापकों के बैठने के लिए बने कक्ष की ओर गए। उस समय इत्तिफाक़ से कमरे में कोई नहीं था। नहीं तो मित्र के कपड़ों को ज़रूर गिनता। मित्र ने सहज भाव से अपने गरम कपड़े निकालकर एक कोने में इस निमित्त खड़े स्टेंड पर टांग दिये, जिनमें एक स्वेटर, एक कोट और एक आदमक़द ओवरकोट शामिल था। ओवरकोट इतना बड़ा था कि स्लीपिंग सूट के अभाव में उसे ओढ़कर सोया जा सकता था। मैंने ठीक से ध्यान नहीं दिया, हो सकता है वह स्लीपिंग सूट ही रहा हो जिसको मित्र ने कलाकारी के साथ ओवरकोट बनाकर पहना हो। ऐसे कार्यों में मित्र निपुण थे। मैं तो क्योंकि सात समुंदर पार उनसे मिलकर ही इतना खुश था कि कपड़ों पर ध्यान न गया था। उनसे मिलकर उनके आकार-प्रकार से आतंकित भी अब न था। अंततः मैंने पूछ ही लिया कि बंधु इतने कपड़े लादने का क्या मतलब? कोई कायदे का ठंड निवारक-वस्त्र खरीद लीजिये। आजकल बहुत पतले और हल्के, साथ ही ठंड से बचाने वाले सुंदर-सुंदर वस्त्र आ गए हैं। कोई अच्छी-सी जैकेट ही ले लीजिये। बोले व्यर्थ भाषण न दो। इतने महंगे कपड़े खरीदने का औचित्य? भारत में तो सब बेकार हो जाएंगे। यहां के लिए ये काफी हैं। इस समाज में कपड़ों पर कोई ध्यान नहीं देता। नए आए हो, कुछ ही दिनों में धीरे-धीरे सब समझ जाओगे। कक्षा में अभी देर है, चलो, चाय पीने चलते हैं। कपड़ों के बिना अब मित्र बहुत कमजोर लग रहे थे, पर चाल तेज़ हो गयी थी। ये बात अलग है कि चाय और एक पैकेट बिस्किट के पैसे मैंने ही दिये। क्योंकि आदतन अपनी जेब तो मित्र कमरे में ही छोड़ आए थे। 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

नवीन साहित्य सेवी

मिलने आते हें प्रश्नों और जिज्ञासाओं का अम्बार लगा देते हैं. उनकी जिज्ञासाओं की गुणवत्ता इतनी हाई पोटेंसी की होती है कि कई बार तो मुझे उनके समाधान के लिए टाइम आउट लेकर अलग से पढ़ना पड़ता है. दिल्ली में हो रही साहित्यिक गतिविधियों के बारे में सजग रहना पड़ता है. न जाने कब किस कार्यक्रम के बारे में पूछ लें. हालांकि साहित्य सीधे-सीधे उनकी दिलचस्पी का क्षेत्र नहीं रहा है और न ही कभी उनकी प्राथमिकता. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से घटी घटनाओं से साहित्य और कला में उसकी अभिरुचि बढती चली गयी. जैसे सरकारी संस्थाओं के पुरस्कार जिनमें धन भी मिलता है और सम्मान भी. या फिर इन पुरस्कारों का भव्य समारोहों में साहित्य अथवा राजनीति के किसी प्रसिद्ध व्यक्तित्व द्वारा प्रदान किया जाना. और भी कुछ इसी प्रकार की लाभप्रद चीजें शिवाजी रोज खोज लाते हैं. आजकल तो शिवाजी ने लिखना भी शुरू कर दिया है. वह भी सोद्देश्य लेखन. सोद्देश्य लेखन से हमारे इन मित्र का आशय है जिस लेखन से उनका उद्देश्य पूरा होता हो यानी लाभ प्राप्त होता हो. आजकल शिवाजी के अन्दर यह आकांक्षा बलवती होने लगी है कि वे कुछ लिखें. उनको भी एक ऐसा पुरस्कार मिलना चाहिए जिससे कुछ आय भी हो. जब वे नौकरी में थे तो उनकी रूचि केवल साहित्य चर्चा तक सीमित थी लेकिन अवकाश प्राप्त करने के बाद उनकी रूचि लिखने और सुनाने में अधिक हो गयी है. पहले बात केवल शौक तक सीमित थी पर अब शौक गहराकर आदत में बदल चुका है. आज स्थिति यह है कि वे जब भी कोई नयी रचना लिखते हैं तो अपना पहला श्रोता मुझे बनाते हैं. मेरी हिंदी पढ़ाने की नौकरी अथवा मेरे हिंदी अध्यापकत्व को वे हिंदी सेवा मानते हैं, अतः वे कहते हैं कि उनकी रचनाएँ सुनना और सुनना ही नहीं उनपर टिप्पणी करना मेरी पेशेगत और नैतिक ज़िम्मेदारी है. अपने मित्र की बात मानकर और उनका पडौसी होने के नाते मैं अपनी ज़िम्मेदारी बड़ी श्रद्धा व लगन के साथ पूरी करता हूँ. लेकिन यही आजकल मुसीबत का कारण बना हुआ है. कारण यह है मित्र अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं. पुस्तक प्रकाशित करना या करवाना आज वैसे भी कोई समस्या नहीं है और यदि आपके पास छोटा सा भी कोई लाभ करा सकने वाला ऐसा पद है तो काम और आसान हो जाता है. फिर शिवाजी तो सरकार के एक बड़े विभाग में बड़े अधिकारी रह चुके हैं. सार्वजनिक क्षेत्र के एक उपक्रम में निदेशक भी रह चुके हैं. अतः उनके लिए छपना कोई समस्या नहीं है. बात किसी नामी प्रकाशक के यहाँ से रचना के प्रकाशित होने की है. आजकल मेरे ये मित्र कुछ इसी प्रकार की उधेड़बुन में हैं कि क्या छपवाऊँ कहाँ छपवाऊँ और फिर कहाँ विमोचन करवाऊँ, किससे कराऊँ? आदि आदि. अच्छे सलाहकार के रूप में उनकी उम्मीद एक मैं ही हूँ. आज यही हुआ. सुबह जब मैं घर से अपने विश्वविद्यालय के लिए निकल रहा था तो ठीक उसी वक्त मेरे ये पड़ौसी नवोदित साहित्यकार साथी मुझसे मिलने आ गये. सुबह-सुबह की बात थी. विश्वविद्यालय जाना था, कक्षा के लिए देर भी हो रही थी, इसलिए लंबी बातचीत की स्थिति में तो मैं बिलकुल नहीं था। लेकिन साहित्यकार मित्र तो आखिर मित्र ही ठहरे । फुरसत के साथ आये थे। लग रहा था कि उनको जाने की कोई जल्दी नहीं है। मैं चिंतित था और वे निश्चिंत थे. मैं डर रहा था कि मित्र कहीं चिपक ही न जायें। लेकिन मेरी आशंका सच निकली. वास्तव में मित्र लंबी बातचीत के मूड में थे. दरअसल उन्होंने कहीं से ज़बरदस्त प्रेरणा लेकर ढेर साड़ी कवितायेँ लिख डालीं. अपनी कविताओं का एक संकलन भी तैयार कर लिया है. वह अपनी उसी पुस्तक के बारे में बात करने आये थे। बात पुस्तक के प्रकाशन की उतनी नहीं थी जितनी उसके किसी अच्छी जगह विमोचन की। विमोचन कहां करवाया जाय,किससे करवाया जाय? इसे लेकर मित्र उधेड़बुन में थे. उनका आग्रह था कि उनकी पुस्तक का विमोचन किसी ऐसी जगह करवाया जाय जहां विमोचन करवाने से उन्हें प्रसिद्धि मिले। मैंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय में करवा देते हैं। विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से विमोचन करवा देते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि आईआईसी में करवाइए । मैंने सुना है कि वह बहुत शुभ स्थान है। प्रकाशकों की भी पसंद की जगह है। वहां पत्रकार भी आसानी से आ जाते हैं. और यदि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में नहीं तो इंडिया हेबीटेट सेंटर में प्रबंध करवा दीजिए। लेकिन इन दोनों के अलावा और कहीं नहीं। उसने यह भी कहा कि विमोचन में नामी व्यक्तित्वों को ज़रूर बुलाना है। उनके आने से समारोह की शोभा और भी बढ़ जाएगी। तभी तो लोगों का ध्यान पुस्तक और पुस्तक के लेखक दोनों पर जाएगा। लोग मेरी किताब को पढ़ेंगे । नहीं पढेंगे तो भी किताब पर समीक्षाएं तो अवश्य लिखेंगे। कभी कभी बिना पढ़े भी तो समीक्षाएं लिखी ही जाती हैं। अख़बारों में मेरी चर्चा होगी । मैं उनकी बात सुन रहा था। सहमति में सिर भी हिला रहा था। उन्होंने जो कुछ कहा मैंने सहर्ष स्वीकार किया। सब तरह के सहयोग का वादा किया, नमकीन, बिस्कुट तथा चाय के साथ उनकी खातिर की, कार में साथ बिठाया और समस्या साथ लेकर विश्वविद्यालय के लिए चल दिया।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

जे एन यू में बस

बात जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र जीवन के आरम्भ के दिनों की है. उन दिनों कैम्पस में कुछ ही बसें चलती थीं. जब तक पूर्वांचल का काम्प्लेक्स नहीं बना था तो बस केवल गोदावरी हॉस्टल तक ही आती-जाती थीं. आरम्भ में 612 और 613 नंबर की बसें चलती थी. 612 सफदरजंग हॉस्पिटल तक जाती थी और 613 डाउन कैम्पस तक। कुछ दिनों बाद 666 नंबर की एक और बस चली जो मुद्रिका की तरह माइनस और प्लस दिशाओं में चलती थी और मुनीरका, सरोजिनी नगर, सफदरजंग हॉस्पिटल, एआइआइएमएस, ग्रीन पार्क, आईआईटी गेट, आईआईटी हॉस्टल, जेएनयू के पुराने कैम्पस, बेर सराय, मुनीरका डीडीए फ्लेट्स और जेएनयू के नए परिसर के बीच चक्कर लगाती थी फिर इसी प्रकार विरीत दिशा में उसी प्रकार चलती थी. इसके कुछ दिनों बाद जब पूर्वांचल परिसर बन गया जिसमें ब्रह्म पुत्र हॉस्टल और महानदी हॉस्टल और शिक्षकों के लिए आवासीय परिसर थे तो 615 नंबर की एक बस और जुड़ गयी और सभी बसें पूर्वांचल परिसर तक जाने लगीं. कुछ बसें ड्राइवरों और कंडक्टरों की ड्यूटी समाप्त होने के समय कभी-कभी वसंत विहार डिपो तक ही जाती थीं और वहां से किसी दूसरी बस में जाना पड़ता था जिसके स्टाफ की ड्यूटी शुरू हो रही होती थी. लेकिन धीरे-धीरे डीटीसी बस वालों ने इस ड्यूटी शिफ्ट होने की कला को अपनी सुविधानुसार जेएनयू जाने से बचने के लिए एक आदत ही बना ली थी. आदत यह थी कि रात होते ही उन दिनों डीटीसी बस वाले जेएनयू के परिसर में अन्दर जाने में आनाकानी करने लगते थे. वे अक्सर ड्यूटी के पूरे होने के वक़्त का बहाना बना दिया करते या बस को ख़राब बता देते. हाँ यदि सवारियां अधिक हों तो जहां तक सवारियां जाने वाली होतीं बस को वहीं तक ले जाते थे. अंतिम स्टॉप पूर्वांचल होता था जहाँ रिहायशी मकानों के साथ-साथ दो हॉस्टल भी थे. एक विवाहित छात्रों के लिए और दूसरा लड़कों का हॉस्टल. उनमें से ब्रह्मपुत्र हॉस्टल में हमारे सहपाठी रामकृष्ण पाण्डेय रहा करते थे. पाण्डेय जी उन दिनों समाचार भारती नाम की एक न्यूज एजेंसी में काम किया करते थे और देर रात को बस से लौटते थे, वह भी प्रायः आखिरी बस से. बस वाले वैसे तो उनको पहचान गए थे, अतः कृपा पूर्वक आखिरी बसस्टॉप तक बस को ले जाते थे, पर कभी-कभी बसस्टॉप दूर होने के कारण कोई-कोई ड्राइवर समय की बचत के लिए गंगा हॉस्टल पर ही बस रोककर, सवारियां उतारकर वापस लौट जाता था. अगर किसी मजबूरी में आगे तक जाना ही पड़े तो बहुत गुस्से में बिना क्लच दबाये, जोर से गेयर डालकर, नयी बन रही पर तारकोल से बनी सड़क से ठीक पहले की हालत वाली गड्ढेदार और ख़राब सड़क पर झटकों के साथ बस को तेजी से भगाते हुए चले जाते थे. पूर्वांचल परिसर में लगभग चलती बस से ही सवारी को उतर जाने के लिए विवश करके बिना कोई नयी सवारी लिए सीधे डिपो वापस भाग जाते थे. ऐसा गुस्सैल ड्राइवर किया करते थे, सब नहीं. उस ज़माने में डीटीसी बस चालकों का बहुत बुरा रवैय्या था. वैसे वहां सावधानी के लिए औ हर बस पूर्वांचल अवश्य जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए डीटीसी ने एक टाइम कीपर भी पूर्वांचल बस स्टॉप पर तैनात कर रखा था. जा तक वह रहता तो व्यवस्था बनी रहती. वह भी बेचारा धनुष के आकार का था. पता नहीं क्या रोग हुआ होगा कि उसकी पीठ संसार के बोझ से या डीटीसी के कामकाज के बोझ से समय से कुछ पहले ही झुक गयी थी. इस कारण उसकी निगाह सदैव नीचे को रहती थी. जब उससे कई बार बसों के आने-जाने के बारे में सवाल किये जाते तो पांच बार किये गए सवालों के उत्तर केवल एक बार में दिया करता था. ऐसा लगता था कि प्रश्न का उत्तर देने के लिए वह और प्रश्नकर्ताओं का इंतजार करता था और जब सब प्रश्नकर्ता इकठ्ठा हो जाते तो सबको एक साथ उत्तर दे देता. तब तक बस भी आजाया करतीं और लोग बिना उसके उत्तर की प्रतीक्षा किये बस में बैठ जाना ही बेहतर समझते. रोज़ एक जैसी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ऐसी स्थितियों की धीरे-धीरे आदत ही बन गयी. लेकिन शाम को वह भी टाइम कीपिंग को महँ दार्शनिक कार्ल-मार्क्स के भरोसे छोड़कर अपने घर चला जाया करता था.
बस-व्यवस्था की दूसरी स्थिति ऐसी थी कि यदि बस में सवारियां बहुत कम हों तो चालक द्वय कोई न कोई बहाना बनाकर बस को प्रायः मुनीरका से अगले स्टॉप पर ही रोक देते थे और इंजिन बंद कर दिया करते. लोगों को ऐसा लगता कि जैसे बस में कुछ खराबी आ गयी. ज्यादा पूछताछ करने पर कोई उलटा-सीधा ज़बाव दे देते थे. दो-चार लोग तो कुल होते ही थे, विशेषकर रात के समय, तो मन मारकर बस से उतर कर पैदल ही चल देते थे. शर्म और संकोच अलग से होता था कि वैसे तो क्रान्ति करने चले हैं पर बस ड्राइवर तक को कुछ कह नहीं सकते. शायद इस लोभ से कि उसी मजदूर वर्ग से है, जिससे हमें सहानुभूति है और अंततः यही तो क्रांति में साथ देगा. उसको नाराज़ न करो. अतः सब शांत भाव से सिर नीचा किये, बिना एक दूसरे से बात किये इस प्रकार धीरे-धीरे अपने गंतव्य के लिए चल देते थे जैसे कि श्मशान में कोई मुर्दा जलाकर आ रहे हों.
कभी-कभी कम लोगों को तो ज़बरन भी उतार दिया करते थे और यदि उससे भी काम न चले तो ऐसी कोशिश करते कि जितनी भी सवारियां जेएनयू के परिसर में अन्दर जाने वाली होतीं वे किसी प्रकार स्वयं बाहर ही उतर जाएँ. अतः कुल मिलाकर आपके पास परिसर के बाहर ही बस से उतर कर पैदल चलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता था. या फिर बहुत हिम्मत दिखाई तो बस वालों से बहस कर ली, थोडा-सा लड़ लिए. खड़ी बोली के असल अक्खडपन और लक्कड़पन का आनंद ले लिया. वैसे ऐसा कभी-कभी ही होता था कि किसी ड्राइवर द्वारा ऐसी भाषा में डांटा जाता कि लगता डांट से अच्छा होता कि वह पिटाई ही कर देता. खैर, शाम के बाद अँधेरा होते ही वैसे भी दो चार लोग ही रह जाते थे तो थोड़ी निरर्थक बहस के बाद पैदल यात्रा का विकल्प ही शेष बचता था. मेरे साथ भी ऐसा कुछ प्रायः होता था और वैसा ही उस दिन भी हुआ. उनकी ही भाषा में बात करने के बावजूद. ड्राइवर बोला कि ‘तम नी समझे कै भाई, कहा न कि गोली होल्लो’ यानी ‘भाई तुम नहीं समझे क्या. कहा नहीं कि गोली की रफ़्तार से निकल लो’. मैंने सोचा कि यदि सतलज हॉस्टल बताया तो ड्राइवर कहेगा कि पास ही है, पैदल निकल जाओ. दूर बताया तो इसको हॉस्टल तक छोड़ने जाना ही पड़ेगा. मुझे पाण्डेय जी द्वारा बताई तरकीब सूझी. जो मैंने पहले भी एक-दो बार आजमाई थी और बहुत कारगर साबित हुई थी. उन्होंने ऐसी हालत से निपटने के लिए एक उपाय बताया था कि यदि ड्राइवर वसंत विहार डिपो या मुनीरका पर ही बस से उतर जाने को कहे, तो उससे कहना कि पूर्वांचल हॉस्टल जाना है. वह फिर मना नहीं करेगा क्योंकि दूर होने के कारण वह आपको वहां अवश्य ले जाएगा. फिर आप रास्ते में अपने हॉस्टल यानी सतलज पर उतर जाना. अतः एक दो बार ऐसा ही हुआ और पाण्डेय जी द्वारा बताई गयी तरकीब काम आई थी. आज भी मैंने वही दोहराया. वैसे भी विश्वविद्यालयों, कालेजों और स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की धोंस और क्रांति प्रायः अपने संस्थानों के अन्दर तक सीमित रहती है और यदि बहुत जोर मारा तो आप-पास के दुकानदारों और रिक्शे चालक आदि तक. बस में भी केवल कैम्पस के अन्दर तक. मैंने भी सोचा कि पहले कैम्पस तक तो चाले बाद में सब देखा जायेगा. हम कुल दो बचे थे. एक मैं और दूसरा मेरा एक ईरानी मित्र. वह तो हालाँकि कह रहा था कि छोड़ो, हम यहाँ से पैदल ही निकल जाते हैं. बहुत दूर भी नहीं है. लेकिन मैं साढ़े बारह रुपये के अपने बसपास का पूरा आनंद लेने के मूड में था. उससे कहा कि तुम चुप रहो. मैं बात करता हूँ. मैंने ड्राइवर से कहा कि हमें पूर्वांचल जाना है. ड्राइवर पूरा घाघ निकला. वह संभवतः पहचान गया. हो सकता है मैंने पहले अपनी तरकीब उसी के साथ आजमाई हो. अतः उसने एक जोर के झटके के साथ गेयर डाला और तुरंत बस दौड़ा दी. रास्ते में गंगा हॉस्टल आते ही मैंने उससे कहा कि रहने दो. अब हम चले जायेंगे. लेकिन वो तो गुस्से में था. बोला कोई बात नहीं. अब तो तू पूर्वांचल ही जायेगा. बिना ठीक से ब्रेक लगाये, बस को मोड़ों पर दौड़ाता हुआ वो चल दिया. दर के मारे दोनों हाथों से हम लोग हैन्डिल कसक पकडे हुए थे. फिर भी झटकों ने हिलाकर रख दिया. कमबख्त सर्दी की रात में 11 बजे पूर्वांचल होटल पर हम दोनों को बस से उतारकर वापस चला गया. मैंने उससे बहुत कहा कि यार गलती हो गयी, मुझे दरअसल सतलज हॉस्टल ही जाना था. चालाकी में ही कहा था. माफ़ करो. किराया भी और ले लो पर वापस ले चलो. यहाँ रात में अब कोई दूसरा साधन नहीं मिलेगा. पर सब अनुनय-विनय व्यर्थ. रात में सर्दी में टहलता हुआ और सच-झूट पर ईरानी दोस्त के भाषण का आनंद लेता हुआ 12 बजे अपने हॉस्टल पहुंचा.