एक लम्बे अंतराल के
बाद कल न चाहते हुए भी त्रिशंकु जी दिखाई दिए. न जाने अबतक कहाँ छिपे हुए थे. प्रोफेसर
विट्ठलनाथ ‘त्रिशंकु’ आधुनिक परंपरा के आचार्य हैं. देखने में बिलकुल लघुमानव की
तरह. शायद उन दिनों विजयदेव नारायण साही उस निबंध को लिख रहे होंगे जिन दिनों श्री
वल्लभनाथ का जन्म हुआ था या वल्लभनाथ के माता-पिता ने भविष्य के गर्भ में छिपी
लेकिन ऐतिहासिक महत्व प्राप्त करने की सम्भावना वाली अपनी संतान के बारे में कल्पना
की होगी. उनके बचपन के बारे में तो कुछ भी कहना आज संभव नहीं है क्योंकि उनका बचपन
एक किवदंती की भांति है जिसे केवल उनके माता-पिता ने देखा था और वे जन्म के अनुक्रम
के हिसाब से अपने तीसरे बेटे को खलनायकी से भरी इस दुनिया में न जाने किसके हवाले
करके बैकुंठलोक सिधार गए. बालत्रिशंकु ने स्वयं भी अपना बचपन उस तरह नाहीं देखा था
जैसा वे देखना चाहते थे और यदि कुछ देखा भी होगा तो प्रो. त्रिशंकु उसे अब याद
नहीं करना चाहते. कारण यह है कि वे अपने बचपन की खट्टी-खट्टी यादों में अब वे
लौटना नहीं चाहते. वैसे देखा जाय तो ज्ञान प्राप्ति के दिनों में तो कष्टों में
बीता उनका जीवन ही उनकी सबसे बड़ी पूँजी था, उनका संबल था पर जैसे ही उनको ब्रह्म-ज्ञान
मिला, सत्य का आभास हुआ अथवा परमसत्य का इलहाम हुआ तो उनका कष्टों से भरा वही
बेशकीमती अतीत ही उनके लिए समस्या बन गया. न जाने क्यों अब वे उसको किसी नव धनाड्य
– नए-नए बने धनवान व्यक्ति - की भांति बिसरा देना चाहते थे. परिणामस्वरूप जो भी व्यक्ति
उनके उस अतीत की याद दिलाता उसको वे बेहद नापसंद करते. उनके पूर्व परिचित और
मुसीबतों में साथी रहे लोग और खासकर वो जो उन्हें पुराने चश्मे से देखते थे, बिलकुल
नहीं भाते थे. ऐसे लोगों से बचने के लिए प्रो. विट्ठलनाथ ने अपना पता भी बदल दिया,
फोन नंबर बदल दिया, यहाँ तक कि अपना पुराना फोन यानी फोनयंत्र तक बदल दिया.
फोन डायरेक्टरी तो वे कब की बदल चुके थे बल्कि उसको जल समाधि दे चुके थे. मैंने
ऐसा पहला चरित्र देखा कि तरक्की के साथ-साथ जिसकी शक्ल और अक्ल दोनों बदल गए हों. पुरानी
स्मृतियों को वे अपने पुराने कस्बे में घर के समीप से निकलने वाली किसी गंगनहर में
बहा आये थे और नयी स्मृतियों के पीछे दौड़ लगाने लगे थे. परिणामस्वरूप नए शहर, नयी
नौकरी, नए लोगों और नए विचारों में रच-बसकर वे खुद भी नित नूतन होते गए. सांसारिक
और अलौकिक बौद्धिक सम्पदा से संपन्न परम तत्व ज्ञानी. परम स्वतंत्र और नंगे सिर. मतलब
कि ‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोई’ जैसा भाव लिए हुए. किसी का हाथ तो क्या वह गाँधी टोपी
तक जिसके अन्दर से सर्दी के मौसम में केवल उनकी आँखें ही दिखाई देती थीं, उन्होंने
अपने सिर पर न रहने दी. किसी समय वह टोपी ही उनकी पहचान हुआ करती थी. जिस किसी ने
उनको देखा होगा वह वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के भूतपूर्व स्पिनर लैरी गोम्स की पुरानी
तस्वीर देखकर उनके प्राचीन रूप का अंदाज बड़ी आसानी से लगा सकता है. उनके गाल और
बाल दोनों ठीक गोम्स की तरह ही हुआ करते थे. अब शक्ल और अक्ल दोनों बिगड़ गयी हैं. प्रतिष्ठित
भारतीय विद्वानों में से तो किसी से उनकी तुलना नहीं की जा सकती पर विदेशी
आचार्यों में भी किसी से उनकी उपमा देने के लिए तलाश चल रही है. ज्ञान के भार से
इतने गंभीर हो गए है कि किसी को देख ही नहीं पाते. कंधे इतने झुके हुए कि किसी भी
तरह का कोई हल्का-सा थैला भी वहां स्थान नहीं पा सकता, आँखे छोटी पर नीचे झुकी हुई
जैसे ज़मीन के अन्दर का सम्पूर्ण रहस्य जानने को उद्यत हों. एक हाथ में अपनी दाहिनी
तरफ सीने से लगाकर ले जाई जा रही आलोचना की चार-पांच भारी-भारी पुस्तकें जिनके
शीर्षक देखने और उनको पढने में ही किसी विद्यार्थी को आधा घंटा लग जाए. साथ में लिए
हुए कक्षा में पहुँचते हैं. कभी नहीं हँसते और किसी समूह में तो कदापि नहीं लेकिन
सुना है कि वे अकेले में कमरा बंद करके मुस्कराते हैं. अगर मान लिया जाय कि आचार्य
सचमुच मुस्कराते हैं तो दुनिया के पहले विद्वान व्यक्तित्व होंगे जो मुस्कराते हैं
तो आवाज करते हैं. उनको देखकर और उनसे बात करके आपको लग सकता है कि जितना उनको पढना
था या फिर पढने की जितनी सामर्थ्य उनमें थी, वे उसे बीस वर्ष पूर्व ही पढ़ चुके
हैं. उनके शरीर पर केवल ज्ञान का बोझ ही शेष रह गया है जिसके नीचे नित्य-प्रति वे
दबे चले जा रहे हैं. अब वे सूफियों की भांति स्वयं ही किसी को ज्ञान दें तो बोझ कम
हो और आचार्य किंचित हल्के हों. उन ज्ञानियों की भांति जिनके बारे में बचपन में
सुना करते थे कि ज्ञान के अपच से वे बहुत परेशान रहा करते थे. परेशां भी इतने कि
जब तक किसी सुपात्र पर उस ज्ञान को उड़ेल न दें उनको और उनकी आत्मा को किसी तरह भी
शांति नसीब नहीं होतो थी. आचार्य भी इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि किसी तरह ज्ञान-दान
करके उनके शरीर को आराम मिले. ........
मंगलवार, 18 दिसंबर 2018
एक अलग पोस्ट
एक अलग तरह की पोस्ट
कभी-कभी आदमियों के ‘हवेले’ से बाहर निकलकर भैंसों के ‘तबेले’ में भी जाना चाहिए. थोड़ी देर के लिए ही सही शोर-शराबें से बचे रहेंगे. मैं एक दिन वहां गया. इन भैंसों में प्रमुख थीं – भदावरी (उत्तर प्रदेश), मुर्रा (पंजाब), मेहसाना (गुजरात). मैंने टोडा (तमिलनाडु), सुरति (गुजरात), नागपुरी (महाराष्ट्र), जाफराबादी (काठियाबाड़), नीली रावी (पाकिस्तानी) आदि नश्लों की भैंसें नहीं देखीं. हालाँकि इन भैसों के बारे में सुना बहुत है. मेरे पिताजी को भैंसों का बहुत शौक था. वे अच्छी नश्ल की भैंसें रखना पसंद करते थे. उनका कहना था भैंस भले ही दूध कम दे लेकिन भैंस होनी सुन्दर चाहिए. उनके पास दूद-दूर के व्यापारी भैंस बेचने और खरीदाने आते थे. मैंने देखा कि पिताजी को भैंसों की बेहतर जानकारी थी पर वे भैंसों के बेचने और खरीदने में घाटा ही सदैव उठाते थे. दादाजी उनको सदैव सचेत करते थे और कहते थे कि व्यापार का काम हमारा नहीं है. हम तो किसान हैं और किसानी ही हमें करनी चाहिए. ये भैस खरीदना बेचना बंद करो. जो आ गयी, दूध अच्छा देती है तो बस, उसे रहने दो.’ पर पिताजी कहाँ मानने वाले थे. मुझे तो विश्वास नहीं पर मेरे मित्रों ने बताया कि जब वे मेरे पास जामिया में आया करते थे तो चुपके से ओखला जाकर भैंसों के बारे में जानकारी लिया करते थे. हालाँकि भैंस पालना उन्होंने बहुत पहले छोड़ दिया था. उन्हीं से पता चला कि भैंसों की नश्ल और उनकी गुणवत्ता को कैसे पहचाना जा सकता है. वे बताते थे कि भैंसों में नीली रावी (पाकिस्तानी), मुर्रा, मेहसाणा के सींग बहुत सुन्दर लगते हैं और ऊपर को गोलाकार इस तरह मुड़े हुए होते हैं कि उनमें कभी-कभी तीन छल्ले तक बन जाते हैं. लेकिन टोडा, जाफराबादी, भदावरी और नागपुरी भैंसों के सींग लम्बे होते हैं. देशी भैंस वे न जाने किस भैंस को कहते थे लेकिन मैंने गाँव में देखा था कि वह थोड़ी सीधी-सी होती थी. सुरति भैंस दूध अधिक देती है पर कद में अपेक्षाकृत छोटी होती है. हमारे घर में कुन्नी नाम की जो भैंस थी वह 16 किलो दूध प्रतिदिन के हिसाब से दूध देती थी. आठ किलो सुबह और आठ किलो शाम को. मेरी माताजी को उस भैंस के ‘कटिया’ (पड़िया) देने का बड़ा इंतजार रहा करता था. चौथी बार में उसने कटिया/पड़िया दी जो उससे भी अधिक खूबसूरत निकली. मैं और मेरे घर में भी गाय को कभी पसंद नहीं किया गया और न ही गाय के दूध को. मेरी माताजी को गाय के दूध में से अजीब-सी आया करती थी. वे कहती थीं कि ‘गाय के दूध में एक अलग तरह की गंध होती है जो भैंस के दूध से भिन्न होती है. दूध भी गाया का पतला होता है’. मुझे लगता था कि शायद जिस भैंस की नश्ल का कोई पता न चले उसको लोग देशी कह देते थे, हालांकि सभी भैसें भारतीय ही हैं और जहाँ तक मेरी जानकारी है भैंसें भारत में ही अधिक पायी जाती हैं. विदेशों में मैंने भैंसें नहीं देखीं, पर सोचता हूँ कि यदि अंग्रेजी में ‘बफेलो’ शब्द है तो दुनिया के किसी अन्य हिस्से में भैंस भी होती ही होगी. लेकिन मुझको शक है.
सोमवार, 17 दिसंबर 2018
जामिया में पहली कक्षा
जामिया में मेरी अध्यापकी सन मार्च 1984 शुरू
हुई और उसी साल से जामिया में एम.ए. हिन्दी आरम्भ हुआ था. उस समय प्रथम वर्ष के बैच की कक्षाएँ चल रही थीं. वार्षिक पाठ्यक्रम था और अप्रैल के पहले सप्ताह तक कक्षाएँ चलनी थीं. हमारा
टाइम-टेबल अगले अकादमिक वर्ष से यानी एक अगस्त
से आरंभ होना था. प्रोफ़ेसर मुजीब रिज़वी उस समय विभाग के अध्यक्ष थे, छात्र-कल्याण
अधिष्ठाता भी थे, स्टेट रिसोर्स सेंटर तथा जामिया के अन्य भी अनेक विभागों की उनपर
जिम्मेदारियां थीं, अतः उनके द्वारा पढाये जा रहे पाठ्यक्रम का कुछ भाग शेष रह गया था. उन्होंने मुझसे अपनी कुछ कक्षाएँ
शेयर करने के लिए कहा. मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती थी? जामिया
में नयी-नयी नौकरी मिली थी. एक सप्ताह से खली बैठा हुआ था, नया-नया पाठ्यक्रम बन
रहा था. अत: ख़ुशी-ख़ुशी मैं प्रो. मुजीब रिज़वी द्वारा ली जा रही कक्षा में चला गया. तकनीकी रूप से वह जामिया में
मेरी पहली कक्षा थी. विद्यार्थियों
में अनेक तो दिल्ली के स्कूलों के अध्यापक थे जो बी. ए. करने के बाद बी.एड. तो कर
चुके थे पर हिंदी में एम. ए. नहीं थे. उन दिनों जामिया में लड़कियों. जामिया के
कर्मचारियों और सेना में काम करने वालों और प्राथमिक विद्यालयों के अध्यापकों के लिए
प्राइवेटछात्र के रूप में परीक्षा देने की व्यवस्था थी. ऐसे विद्यार्थी यदि चाहते
तो नियमित कक्षाएं भी ‘अटेंड’ कर सकते थे. इसीलिए अनेक अध्यापक भी हिंदी की उस
कक्षा में प्राइवेट होते हुए भी नियमित पढ़ रहे थे. खैर एम.ए. हिंदी की जामिया की
पहली कक्षा में भी लगभग आठ ऐसे विद्यार्थी थे जो पहले से ही अध्यापक थे. उनमें
प्रायः सभी मुझसे उम्र में बड़े थे. बड़े क्या काफी बड़े थे. एक तो ऐसे थे जिनका बेटा
एम.ए. अर्थशास्त्र में और बेटी समाजशास्त्र में एक कर रहे थे. एक तरह से तीनों
समकालीन थे. कक्षा में पहुंचा तो ऐसा लगा कि अभिभावक अपने बच्चों के साथ आये हुए
हैं. पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि यह एम. ए. प्रथम वर्ष की कक्षा है. मैंने
जैसे ही दरवाज़ा खोला कक्षा में बड़ी उम्र वाले लोगों को देखते ही तुरंत दरवाज़ा बंद
कर दिया. वापस लौटने को ही था कि तभी एक छात्र जो संभवतः मुझे थोडा-बहुत जानता था,
बाहर निकलकर आया. वह शायद यह भी जानता था या मुजीब साहब ने कक्षा में बता दिया
होगा कि मैं उनकी जगह कक्षा लेने आने वाला हूँ, उस विद्यार्थी ने मुझे कक्षा में
अन्दर आने के लिये कहा. यद्यपि जे.एन.यू. में शोध करते हुए ऑप्शनल हिंदी की
कक्षाएं पहले ही ले चुका था पर यह मामला दूसरा ही था. डरते-डरते कक्षा आरम्भ की. फिर
धीरे-धीरे फ्लो बना और अध्यापकी शुरू हो गयी. उस कक्षा में मुझे जे.एन.यू. में
गुरुवर नामवर सिंह द्वारा एम.ए. के प्रथम सत्र में पढाया हुआ ‘साहित्य की रूपवादी दृष्टिकोण’
वाला पाठ्यक्रम बहुत काम आया. पढ़ाते हुए मैंने अनुभव किया कि कुछ छात्र तो बहुत ही
तल्लीन भाव में निमग्न लगभग उकडू-से होकर अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठे थे और मुझे लग
भी रहा था कि मेरी बात को कुछ-कुछ समझ रहे हैं. कुछ छात्र अपने दिमाग पर बहुत जोर
डालटे हुए ऐसे बैठे हुए थे जैसे की महिलायें गोलगप्पे वाले कि दूकान पर हाथ में
प्लेट या कटोरी पकडे हुए अपनी बारी के आटे या सूजी के बने गोलगप्पे का इंतजार करती
हैं. बाक़ी जिनमें अधिकाँश अध्यापक थे, वे ऐसे बैठे हुए थे जैसे कि बेगानी शादी में
अब्दुल्ला बैठा रहा होगा. ..... शेष बाद में.
बुधवार, 21 नवंबर 2018
पुराना टीवी
कल मैं अपने एक पुराने मित्र के घर गया था तो एक बहुत पुराना टीवी सेट दिखाई दिया. उसे देखकर
मुझे आरम्भ में देखे अनेक तरह के टीवी सेट याद आ गए. आमतौर से सभी ब्लेक एंड
व्हाइट में हुआ करते थे 1982 में एसियन गेम्स में रंगीन समाचार प्रसारित किये जाने
तक. कुछ आरंभिक टीवी सेट तो शटर लगे केस के अन्दर रखे होते थे और उस पर भी एक सुन्दर
कपडे का कवर रखा होता था. टीवी, रेडियो,
फ्रिज, टेलीफोन, मोटर साइकिल-स्कूटर आदि वालों के पडौसियों से अच्छे सम्बन्ध हुआ
करते थे. दूरदर्शन के आरंभिक विकास की चर्चा चली तो वह दौर याद आया जब दूरदर्शन पर
पहली बार सीरियल आना शुरू हुए थे. जहाँ तक मेरी जानकारी है उस समय के सबसे पोपुलर
प्रोग्राम ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ हुआ करते थे. गाँव में टेलीविजन जा ही चुका था और
मेरे पिताजी ने ‘रामायण’ देखने के लिए मुझसे टीवी मंगवाया था. इस निमित्त मै अपने पिताजी
की सेवार्थ 14 इंच का ब्लेक एंड व्हाइट टीवी सेट खरीदकर ले गया था. घर के ऊपर एक ऊँचा-सा
एंटीना लगाया गया. सिग्नल अच्छा आए इस कारण एंटीना इतना ऊँचा लगाया गया था कि उसको
तीन ओर से रारों द्वारा बाँधा गया था. उस एंटीना की आकृति कपड़े सुखाने के लिए
घरों में आजकल बहुत पोपुलर होते जा रहे जहाजनुमा हेंगर की तरह होती थी. हवा के तेज
प्रवाह से कहिए या बंदरों की कृपा से उस एंटीना का एन एंगेल की दिशा अक्सर बदल
जाती थी. उन दिनों आज की भांति 24 घंटे
के कार्यक्रम तो आते नहीं थे. रामायण, महाभारत, फिल्म अथवा चित्रहार आदि ही अधिकांशतः
देखे जाते थे. उस एंटीना की एक खासियत थी कि जब भी कोई कार्यक्रम देखते उससे थोड़ी
देर पहले छत पर जाकर एंटीना की दिशा को पिक्चर क्वालिटी के हिसाब से दाएँ या बाएँ
घुमाया जाता. यह काम घर या पड़ौस का कोई वीर बालक को ही सौंपा जाता. वह वीरबालक बड़े
उत्साह से दौड़ता हुआ छत पर जाता और एंटीना की दिशा को अपेक्षित दिशा में धीरे-से घुमाता.
नीचे बैठे दर्शक बरामदे में खड़े एक और बालक को सन्देश देते कि ‘अभी थोड़ा और, अभी
थोड़ा और, ज़रा-सा और बस-बस-बस. ऊपर गया हुआ बालक नीचे उतरने से पहले पूछ लेता कि हो
गया ठीक? पिक्चर ठीक है अब? ऐसा अधिकांशतः सब जगह किया जाता. यहाँ तक कि शहरों में
भी आंधी या बन्दर कृपा से अक्सर ऐसी-ही स्थिति पैदा हो जाती. धन्य हो केबिल और दिस
एंटीना का कि समस्या का स्थायी हल निकल आया.
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018
सुबह की चाय
आज घर में सुबह-सुबह छ बजे चाय बनाते समय पता चला कि चाय की पत्ती ख़त्म हो गयी है. अब क्या करें. पड़ौस गाँव की तरह ऐसा है नहीं कि चाय की पत्ती, नमक, हल्दी, जीरा, या थोड़ी चीनी आदि आवश्यकता पड़ने पर मांग लिया जाय. हो सकता है कि मांगने पर पड़ौसी दे भी दें पर छवि का क्या होगा. बहुत से काम तो कमबख्त यह छवि ही नहीं करने देती. ध्यान रहे कि छवि घर में किसी का नाम नहीं नहीं है. 'इमेज' के लिए है. आजकल हालत यह है कि 'इमेज ' नहीं है तो कोई मेज उसकी भरपाई नहीं कर सकती. चाहे कितनी भी महँगी क्यों न हो. हैं तो अव्वल दर्जे के बदमाश पर कमबख्त छवि बिगड़ जाय इस कारण ठीक से बदमाशी भी नहीं कर सकते. सड़क-चौराहे पर खड़े होकर कुछ खा नहीं सकते. किसी ने देख लिया तो क्या होगा. गयी इमेज. बहुत मन करता है कि सड़क किनारे खड़े किसी छोले-कुलचे वाले से गर्म-गर्म एक पत्ता बनवाकर वहीं खड़े होकर खाया जाए जहाँ और अनेक सामान्य जन खा रहे हैं ताकि छोले खाते-खाते छोले ख़त्म होने पर कहा जा सके कि 'थोड़े और छोले देना भाई', पर नहीं. चाहे सब सामान ठंडा ही क्यों न हो जाय पर किसी से मंगवाकर कमरा बंद करके छुपकर ही खायेंगे. इमेज का सवाल है. कोई कहेगा कि 'देखिये, कैसे आदमी हैं. छोला-कुलचा खा रहे हैं. जरा इमेज का तो ध्यान रखना चाहिए' जैसे छोला कुलचा न होकर कोई बम हो गया..
खैर छोडिये, मैं तो चाय-पत्ती की बात कर रहा था और सोच रहा था कि हमें पहले से ही कुछ सावधानी रखनी चाहिए ताकि ऐसी स्थिति न आये कि अचानक कोई ज़रूरो सामान घर में ख़त्म हो गया. तभी मुझे पुराना चुटकुलानुमा एक वाकया याद आया जो इस तरह है;
डीटीसी की बस में एक लड़का चढ़ा और उसने कंडक्टर से दो टिकेट मांगे. कंडक्टर को वैसे तो लड़के के मांगने पर दो टिकिट दे देने चाहिए लेकिन यदि वह ऐसा करता तो उसकी उस भारतीय 'इमेज' का क्या होता जिसके अनुसार कोई भी भारतीय किसी से पास गुजरने वाले को भी बिना सवाल-ज़वाब किये जाने ही नहीं देता. भले ही उससे चाहे दूर-दूर का भी ?उसका कोई सम्बन्ध न हो. इसलिए कंडक्टर ने पलटकर पूछ ही लिया कि "दो टिकिट तुम्हें क्यों चाहिय्र? तुम तो अकेले हो."
"एक कहीं खो गया तो?" लड़के ने कहा.
इस पाकर कंडक्टर ने पुनः कहा कि "खो तो दोनों सकते है फिर?"
लड़का भी कहाँ चूकने वाला था. तुरंत बोला कि "मेरे पास बसपास भी तो है. वो कब काम आएगा.?" और मुस्करा दिया.
कंडक्टर को खुद को संभालना मुश्किल हो गया. हिम्मत करके बोला कि "बड़ी सावधानी बरत रहे हो, कहाँ के हो भाई?"
वैसे तो यह तनिक लम्बा सिलसिला है पर कुछ अपरिहार्य कारणवश आगे नहीं लिख सकता. चाय की पत्ती और एतियातन दूध-चीनी लेने जा रहा हूँ. शुभ-प्रभात मित्रो..
खैर छोडिये, मैं तो चाय-पत्ती की बात कर रहा था और सोच रहा था कि हमें पहले से ही कुछ सावधानी रखनी चाहिए ताकि ऐसी स्थिति न आये कि अचानक कोई ज़रूरो सामान घर में ख़त्म हो गया. तभी मुझे पुराना चुटकुलानुमा एक वाकया याद आया जो इस तरह है;
डीटीसी की बस में एक लड़का चढ़ा और उसने कंडक्टर से दो टिकेट मांगे. कंडक्टर को वैसे तो लड़के के मांगने पर दो टिकिट दे देने चाहिए लेकिन यदि वह ऐसा करता तो उसकी उस भारतीय 'इमेज' का क्या होता जिसके अनुसार कोई भी भारतीय किसी से पास गुजरने वाले को भी बिना सवाल-ज़वाब किये जाने ही नहीं देता. भले ही उससे चाहे दूर-दूर का भी ?उसका कोई सम्बन्ध न हो. इसलिए कंडक्टर ने पलटकर पूछ ही लिया कि "दो टिकिट तुम्हें क्यों चाहिय्र? तुम तो अकेले हो."
"एक कहीं खो गया तो?" लड़के ने कहा.
इस पाकर कंडक्टर ने पुनः कहा कि "खो तो दोनों सकते है फिर?"
लड़का भी कहाँ चूकने वाला था. तुरंत बोला कि "मेरे पास बसपास भी तो है. वो कब काम आएगा.?" और मुस्करा दिया.
कंडक्टर को खुद को संभालना मुश्किल हो गया. हिम्मत करके बोला कि "बड़ी सावधानी बरत रहे हो, कहाँ के हो भाई?"
वैसे तो यह तनिक लम्बा सिलसिला है पर कुछ अपरिहार्य कारणवश आगे नहीं लिख सकता. चाय की पत्ती और एतियातन दूध-चीनी लेने जा रहा हूँ. शुभ-प्रभात मित्रो..
मंगलवार, 29 मई 2018
कामवाली का काम
कामवाली कई दिन से घर का काम करने नहीं आई. पहले जब
किसी दिन नहीं आती थी तो फोन कर देती थी. हालाँकि फोन करते समय आमतौर पर उसके दो
बहाने होते थे. एक बहाना होता था कि ‘मेरी तबियत ख़राब है’. दूसरा बहाना होता था कि ‘मेरी बेटी की तबियत ख़राब है’. जब वह अपनी तबियत ख़राब बताती है तो उसका स्वर बदलकर
स्वस्थ व्यक्ति से बीमार व्यक्ति के स्वर में बदल जाता है. थोड़ी कराहट जुड़ जाती है
और आवाज़ में हल्का कम्पन-सा आ जाता है. लेकिन जब वह अपनी बेटी की तबियत ख़राब होने
की बात करती है तब उसकी आवाज़ में अचानक बहुत सारा विश्वास और मजबूती आ जाती है.
कुछ इस प्रकार कि मैं किसी तरह भी यह न कह सकूं कि ‘अरे बेटी बीमार है तो दवाई दिलवाकर आ जाओ’. उसकी अपनी बीमारी भी दो तरह की होती है, एक कि ‘मेरा पेट ख़राब है. दूसरा ‘मेरे सिर में बहुत दर्द है और दर्द के मारे मेरा सिर
फटा जा रहा है’. ये ऐसी
बीमारी है कि दोनों ही बीमारियों का पता लगाना मेरे जैसे साधारण बुद्धि वाले किसी
व्यक्ति के लिए संभव नहीं. खैर, जब किसी भी कारण से काम पर न आने के बारे में कामवाली
का फोन आ जाता है तो मैं पहले दुखी और फिर निश्चिन्त हो जाता हूँ कि अब वह नहीं
आएगी तो मैं कुछ अधिक समय तक आराम कर सकता हूँ. क्योंकि जबतक कामवाली घर में रहती
है, लगातार
यह लगा रहता है कि अब क्या तोड़ेगी, अब क्या गिराएगी? सफाई कहाँ करेगी और कहाँ छोड़ेगी आदि आदि. ऐसा भी होता
है कि वह अक्सर किसी न किसी बात पर नाराज़ होकर घर से आती है तो उसका व्यव्हार
बिलकुल बदला हुआ होता है. वैसे वह अब अपनी नाराज़गी कहाँ और कैसे दूर करे? तो उसका क्रोध अधिकांशतः किचिन में बर्तनों और घर के
दरवाज़ों पर उतरता है. कामवाली के अनमनेपन का शिकार होकर लकड़ी के दरवाज़े तो कम आवाज़
करते हैं पर स्टील के दरवाज़े इतनी आवाज़ करते है कि घर सिर पर उठा लेते हैं.
दरवाज़ों के खुलने और बंद होने तथा बर्तनों के धोये जाने के कामवाली के तरीके से
मैं अनुमान लगा लेता हूँ कि उसका आज का मूड कैसा है. उस दिन मैं सोच-समझकर उससे
किसी काम के लिए कहता हूँ. ऐसे अवसरों पर कामवाली कुछ अधिक टेक्नीकल हो जाती है और
ज़रा-सा अतिरिक्त काम बताते ही नियम बताने लगती है यानी कुछ अलिखित नियम-कायदे जो
शायद सभी कामवालियों ने मिलकर बनाये होंगे. जैसे मैंने एक बार उससे कहा कि जब तुम
झाड़ू लगाती ही हो तो दीवार के कोनों को भी साफ़ कर दिया करो. वह तुरंत उत्तर देती
है कि यह अतिरिक्त काम है. शोकेस, बुक सेल्व, मेज, सोफे किचिन स्लेव, गैस चूल्हा, डाइनिंग टेबिल, सेन्ट्रल टेबिल, टीवी ट्रॉली और खिड़की की जाली आदि को
कपड़े या फिर झाड़ू से साफ़ करना अलग से पैसे की अपेक्षा करता है. उसके सिद्धांत में
शामिल है कि चाय पिएगी पर बनाएगी नहीं’. नियम के प्रावधान के अनुसार चाय पीने के बाद अपने
बर्तनों के साथ केवल चाय बनाने का बर्तन साफ़ किया जा सकता है और कुछ नहीं. यदि साथ
में और बर्तन हैं तो उसकी मर्ज़ी से साफ़ होगे. उन्हें साफ़ किये जाने की बहुत
अपेक्षा अष्टमी से न करें. घर को साफ़ करने का उसका अपना तरीका है. सुबह-सुबह घर
में अन्दर आते ही वह सबसे पहले हिदायत देने के अंदाज़ में कहती है कि पीछे बाहर का
दरवाज़ा खुला है कि नहीं. चाहे द्वार पहले से खुला न हो पर वह पूछती अवश्य है.
हलांकि वह स्वयं दरवाज़ा खोल सकती है पर स्वयं कभी नहीं खोलती और न ही खोलना चाहती, शायद इसका भी कोई कारण हो. झाड़ू लगाने की शुरुआत वह
प्रायः घर के बीच वाले कमरे से करती है. उसके बाद किचिन में जाती है और पानी की
टंकी चलाकर लगभग दस या बीस सेकेण्ड तक अपना सीधा हाथ टोंटी के नीचे लगाकर पानी
गिरती रहती है. फिर दूसरा हाथ पानी के नीचे लगाये रखती है. उसके बाद किचिन में
झाड़ू लगाती है. तत्पश्चात अष्टमी (नाम) बाहर वाले कमरे में झाड़ू लगाती है. सबसे
अंत में वह अन्दर वाले यानी मुख्य बेडरूम में जाकर झाड़ू लगाती है. मैं उस समय
अखबार पढ़ रहा होता हूँ. इस बीच अष्टमी मेरे पास आकर जानना चाहती है कि मुख्य बातें
अख़बार में क्या हैं. मैं एक या दो प्रमुख समाचार उसकी रूचि के हिसाब से अष्टमी को
बता देता हूँ. उसका घर मेरे घर से लगभग दो किलोमीटर तो अवश्य होगा. रास्ते में
अपने साथ आने वाली कामवालियों से सुनी हुई कोई न कोई खबर वह मुझे बताती है और
जानना चाहती है कि अख़बार ने वो खबर छापी है कि नहीं. जब उसको पता चलता है कि नहीं
छापी है तो दुखी हो जाती है पर पता चलने पर कि खबर छपी है तो बहुत खुश होती है. एक
बात मुझे अष्टमी की बहुत प्रभावित करती है कि वह घर में पौंछा बहुत शानदार लगाती
है. बहुत ही कलात्मकता के साथ. उसके इस काम में एक रिदम रहती है. जिस दिन अष्टमी
मन घर में पोंछा लगाने का नहीं होता तो वह अपना चेहरा पीड़ित व्यक्ति की भांति लटका
लेती हैं. ऐसी स्थिति में वह काम करने की गति को बहुत धीमा कर देती है और सवाल
ज्यादा करती है. कभी कभी बिजली को और कभी किसी रिश्तेदार के घर जाने को वह पोंछा न
लगाने के लिए बहाना बनाती है. कभी-कभी वह पोंछा लगाने के बदले आराम करना पसंद करती
है और लगभग आधा घंटे के लिए कमरे में लेट जाती है. एक उसकी बहुत अच्छी आदत है कि
वह लेट कम ही होती है. ……झाड़ू लगाने में उसका उतना इंटरेस्ट नहीं होता.
गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018
मित्र का अधिकार
मेरे साथी प्रोफ़ेसर इस बात से बड़े परेशान थे कि बिना उपयोग करने पर भी बिल
क्यों देना पड़ता है. ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है कि जो जितना वाशिंग मशीन का उपयोग
करे उतना बिल दे. मैंने कहा मैं तो पिछले छः माह से इस अपार्टमेंट में रहता हूँ. मैंने
कभी अपने कपडे वहां नहीं धोये. मेरे फ्लेट में मुझसे पहले रहने वाला सज्जन व्यक्ति
वाशिंग मशीन छोड़ गया था. मैं उसी का उपयोग करता हूँ. मुझे तो यह भी नहीं पता कि
वाशिंग मशीनें आखिर हैं कहाँ? कभी ऐसा सोचा ही नहीं कि बिल आता किस प्रकार है.
अपनी अज्ञानता पर मुझे कमतरी का अहसास हुआ. खैर एक दिन मालूम हो गया कि मेरे साथी
ने अपने हिस्से के बिजली-पानी के बिल का प्रबंध किस तरह कर लिया था. हुआ यह कि एक
दिन जब मैं कक्षा लेकर आ रहा था तो दूर से दिखाई पड़ा कि मित्र तेज़ी से एक गैलरी
में चले जा रहे हैं. मुझे जिज्ञासा हुई कि आखिर ये उधर जल्दी-जल्दी क्यों जा रहे
हैं? उधर तो किसी का अपार्टमेंट भी नहीं है. मैं खुद कभी उस तरफ नहीं गया था. विस्तार
से जानने की जिज्ञासा हुई और यह भी कि मित्र को इतनी जल्दी उधर दिखाई क्या दे गया.
अतः थोड़ी देर रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगा. बहुत देर नहीं हुई. लगभग दो मिनट में
ही मित्र उधर से लौट आये. लेकिन गए खली हाथ थे और आते समय भरे हाथ. दरअसल उनके हाथ
में एक छोटा-सा टब था. मैंने ध्यान से देखा कि उस टब मैं एक बनियान, दो कच्छे, एक
रूमाल और एक तौलिया था. मैंने पूछा कि आप ये इतनी महत्वपूर्ण सामग्री कहाँ से ला
रहे हैं? कहने लगे कि वाशिंग मशीन में कपड़े धोकर ला रहा हूँ. मैंने कहा कपड़े?
हालाँकि थे वे कपड़े ही, पर मेरा दिल उनको उस रूप में स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि
पांच कपड़ों को भी वाशिंग मशीन के हवाले कर दिया जाए. मैंने कहा कहाँ रखी गयी हैं वाशिंग
मशीनें? और सुना था ड्रायर भी हैं अलग से. कहने लगे आपसे पूछता तो आप तो बताते
नहीं. मैंने अपनी पडौसी एक चीनी महिला को परसों कपड़े धोकर लाते हुए देखा था. उससे
ही पूछ लिया. बहुत सज्जन थी. मुझको ले जाकर उसने वह जगह दिखाई जहाँ वाशिंग मशीनें
और ड्रायर रखे हुए हैं. उन पर सभी निर्देश क्योंकि कोरिया भाषा में हैं, चीनी महिला
ने मुझे संकेतों में समझाने की कोशिश तो की लेकिन मैं समझ नहीं पाया. फिर भी
अनुमान से आज पहले प्रयोग के तौर पर अपने कपड़े वाशिंग मशीन में धो लाया. मैंने कहा
कि अनुमान से क्या अभिप्राय? कहने लगे कि साबुन, लिक्विड या पाउडर डालने के तीन कॉलम
बने हैं. मेरे पास पाउडर या लिक्विड तो था नहीं, किसी का पाउडर वहां रखा हुआ था, मैंने
अनुमान से एक तरफ उसी में से लेकर थोड़ा-सा पाउडर डाल दिया और मशीन चला दी. समय
अवश्य अधिक लगा, पर कपड़े अच्छी तरह धुल गए. मैंने समय के बारे में पूछा तो मित्र
ने बताया कि कुल दो घंटे लगे. मेरी रूचि वाशिंग मशीन में तो नहीं थी पर उस जगह को
देखने में अवश्य थी, जहाँ ये उपकरण लगे हुए थे. सोचा कि मित्र की खोज है देख लूं.
संभव है कभी ज़रुरत पड़ जाए. जब गया तो देखा कि सचमुच वहां पांच अत्याधुनिक वाशिंग
मशीनें और दो अच्छे ड्रायर रखे हुए थे. सब का आकर बहुत बड़ा था. कमसे कम दस किलो
कपड़े एक साथ धोये जा सकते थे. मैंने उस मशीन को भी देखा जिसमें मित्रे अपने कच्छे-बनियान
धोकर लाये थे. उस मशीन का साबुन डालने वाला हिस्सा खोलकर देखा तो विचित्र किन्तु
सत्य जैसी स्थिति हो गयी. यानी मित्र ने पडौसी के पाउडर से निकालकर जितना उस मशीन
में डाला था, सब सुरक्षित था. हाँ साथी के कपडे ज़रूर धुल गए थे. मैंने साथी की ओर
देखा तो मुस्कराने लगे. बोले कि चलो अनुभव तो हुआ और कपडे भी धुल गए. धीरे-धीरे और
भी सीख जाऊँगा. अपने हिस्से के बिजली पानी का उपयोग तो कर ही लूँगा जो मेरा अधिकार
है. पता चला कि आजकल अधिकार के लिए सप्ताह में तीन या चार बार कपड़े धोकर ला रहे
हैं. बार-बार दौड़ भाग करते हैं अलग से. धन्य है अधिकार की मादकता का सुख.
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