बुधवार, 3 दिसंबर 2014

चीनी चक्कर


जब मैं प्राइमरी स्कूल की पहली कक्षा में गया तो अपनी कक्षा के अन्य छात्रों की तुलना में कद में छोटा था। एक और छात्र था जो मुझसे भी छोटा था. लेकिन उसका तो नहीं पर छोटा कद होने की वजह से मेरा नाम चीनी पड़ गया। नाम तो कक्षा के मेरे अध्यापक ने रखा था और यह बात केवल क्लास तक ही सीमित थी लेकिन धीरे-धीरे बात मुहल्ले के बच्चों तक पहुंच गयी। वे मुझे चीनी कहकर चिढ़ाते। आरंभ में तो ऐसा कभी-कभी होता था पर जल्द ही इसकी फ्रीक्वेंसी बढ़ने लगी। हद तो तब हो गयी जब बात-बात पर साथी चीनी कह कर चिढ़ाते। कभी कभी तो मैं इतना चिढ़ जाता कि जिस अध्यापक ने यह नाम लिया था छिपकर चालाकी से उसकी साइकिल के पहिए की हवा निकाल देता। मेरी इस शरारत का उन अध्यापक महोदय को कभी पता ही नहीं चला और वो मुझे निहायत शरीफ, सीधी-सादा और आज्ञाकारी विद्यार्थी मानते। दरअसल उन को भी नहीं पता था कि उन्होंने कक्षा के विद्यार्थियों की जो ज्ञानवृद्धि की है उससे मेरा कितना मानसिक नुकसान हुआ था। वास्तव में उन दिनों भारत चीन युद्ध चल रहा था। देश में हर तरफ उस युद्ध की चर्चा थी। अध्यापक महोदय न जाने क्यों स्वयं बहुत तनाव में थे। मैं दूसरी कक्षा का छात्र था, और मेरी उम्र रही होगी लगभग सात वर्ष। मेरी कक्षा के अध्यापक चीनी आक्रमण से बहुत अधिक आहत थे और गुस्सा भी। मैं कयोंकि सामने ही बैठा था अत: उनकी दृष्टि सीधे मुझ पर आकर ठहर गयी। गुस्से से मेरी ओर देखते हुए कहने लगे कि, इतने छोटे-छोटे होते हैं कम्बख़्त चीनी लोग और देखा कितना बड़ा धोखा दिया है इन चीनियों ने। हिम्मत देखो उनकी। कुछ और भी इसी प्रकार बड़बड़ाने लगे। वे तो इतना कहकर चले गए लेकिन मेरे लिए बड़ी समस्या कड़ी कर गए. मेरी उम्र के छात्रों को क्या लेना-देना था भारत-चीनी युद्ध से। उन्हें तो मुझे चिढाने का बहाना मिल गया। पहले तो बात केवल कक्षा तक ही सीमित रही फिर न जाने मेरे साथियों को इसमें क्या उर्वरता दिखाई दी कि उन्होंने इसका युद्ध स्तर पर प्रचार करने का मन बनाया और अध्यापक द्वारा कक्षा में कही बात को गली, मुहल्ले और फिर गांव तक ले गए। उनके लिए यह केवल मनोरंजन का साधन था पर मेरे लिए छवि भंजन का। हालांकि सभी छात्र ऐसे नहीं थे। केवल कुछ ही शरारती थे। पर थे वे एक गंदी मछली की भांति जिनके सामने पूरा तालाब था। परिणामत: मैं अपने ही साथियों से बचने का प्रयास करता।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

जे एन यू की भांग

जेएनयू में जब मैंने पहली बार और वही आखरी बार भांग पी। मैं उस समय एम.फिल का विद्यार्थी था। हमारे एक वरिष्ठ साथी थे घनश्याम मिश्र। (जो संभवत: अब नहीं हैं, अत: उनकी स्मृति के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ)। घनश्याम मिश्र बहुत ही प्रिय स्वभाव के एक मददगार व्यक्ति थे। यद्यपि वे भांग और भांग की प्रजातियों के यूं भी बहुत शौकीन थे पर यदि कोई विशेष अवसर हो तो फिर तो कहने ही क्या? खैर होली पर वे सदैव भांग तैयार किया करते थे। वे गंगा होस्टल में रहते थे ग्राउंड फ्लोर पर। उनकी सेलेक्टिव लिस्ट होती थी और कलेक्टिव आयोजन। फिर बाद में जो आ जाए। ना किसी के लिए भी नहीं। अत:1979 की घटना है जब पं. घनश्याम मिश्र ने कुछ छात्रों के आपसी सहयोग से होली के लिए भांग तैयार करने की योजना बनाई। ज़रूरी सामान खरीदकर लाया गया जिसमें मेवाओं पर विशेष जोर दिया गया था। मिश्र जी के कमरे में बाज़ार से खरीदकर सब सामान लाकर रख दिया गया. देर रात को में अपने कमरे में जाकर सो गया. सुबह के 5 बजे होंगे जब डिब्बों के सड़क पर बार-बार टकराने की आवाज़ से मेरी आँखें खुल गयी. बालकोनी से बाहर झांककर देखा तो दो कुत्ते बड़ी तेजी के साथ पेरियार हॉस्टल की ओर से गंगा हॉस्टल की ओर दौड़े चले जा रहे थे. उनकी पूँछ में किसी शरारती लड़के ने डिब्बे बाँध दिए थे. डिब्बे तीन के थे और उनकी आवाज़ से कुत्ते और भी तेजी से दौड़ रहे थे. अन्याय तो उनके साथ हो ही चुका था. देखकर दुःख भी हुआ. बड़ी रूचि के साथ भांग तैयार की गयी। सामान की कोई कमी नहीं थी. भरपूर दूध और चीनी। बादाम, किशमिश और काजू आदि मेवे मिश्राजी की अलमारी से निकाले गए. किसी साथी ने ध्यान दिलाया कि  पोटली में वजन कल की अपेक्षा कुछ कम है. मिश्राजी मुस्करा कर बोले, जो बचा है सब घोट डालो. देर की तो वजन और हल्का हो जायेगा. भांग खूब मेहनत से तैयार की गयी थी। भांग तैयार करने की प्रक्रिया और उसमें डाली गयी सामग्री को देखकर मन ललचाने लगा था, अत: सोच लिया था कि आज तो भांग का भरपूर आनंद अवश्य लिया जाएगा। होली वाले दिन सभी साथियों ने भांग पी. हमारे एक मित्र थे हरप्रकाश गौड़ और सुरेश शर्मा. उन्होंने भी भांग पी पर उनपर कुछ असर न हुआ. कहने लगे और पीना चाहिए. दोबारा घनश्याम मिश्र के कमरे में गए और पुनः भांग का स्वाद चखा. हरप्रकाश जी को मेवों का कुछ लोभ आ गया अतः भांग के बर्तन की तलहटी से जिसमें भांग भी शामिल थी, काफी सारे पदार्थ लेकर खा गए. परिणाम हुआ कि भांग के नशे में एक व्यक्ति जो जो कर सकता है उन दोनों ने किया, जो सोच सकता है उन्होंने सोचा और जो नहीं कर सकता है उन्होंने न किया. वे कथाकार हो गए, संगीतकार हो गए, गायक हो गए और अभिनेता तो बनना ही था सो बन गए. उनकी हालत देखकर तीसरी कसम के राजकपूर की भांति मैंने एक निर्णय लिया कि जीवन में आगे कभी भांग नहीं पीयेंगे.

शिक्षा और अनुसन्धान

आजकल विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध की जो गति है उससे कोई अनभिज्ञ नहीं है. लोगों को प्रायः शिकायत रहती है कि शोध का स्तर निरंतर गिर रहा है, मेधा का पतन हो रहा है. लोग पढ़ते-लिखते नहीं हैं आदि.. आदि. लेकिन इस चर्चा को छेडने से पहले हम स्वयं पर और अपनी शिक्षा प्रणाली पर भी गौर करें. हम यह क्यों भूल जाते हैं कि इसके ज़िम्मेदार व्यवस्था के साथ-साथ हममें से भी कुछ लोग तो होंगे ही. कितना समय और कितनी ऊर्जा आज शिक्षक लोग अपने छात्रों पर खर्च करते है? अधिकांश विश्वविद्यालयों में आज भी अध्यापन की तकनीक एक तरफ़ा ट्रेफिक की तरह ही है. यानी कि वन वे. कक्षा में शिक्षक ने अपना व्याख्यान दिया या पहले से तैयार नोट्स अथवा लिखा हुआ पढ़ दिया, छात्रों ने ध्यानपूर्वक सुन लिया अथवा व्याख्यान को अपनी नोटबुक में लिपिबद्ध कर लिया. बस, कक्षा की जिम्मेदारी पूर्ण. प्राध्यापक ने न तो छात्रों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करने का प्रयास ही किया और न ही छात्रों ने स्वयं अपनी ओर से सवाल करने का कष्ट किया. दिन, सप्ताह, माह और इसी तरह पूरा सत्र समाप्त. सालों से हम इसी प्रणाली का अनुसरण करते आ रहे हैं बिना इस पर विचार किये कि ये पद्धति हमारी शिक्षा को किधर ले जा रही है. हमारी शिक्षा प्रणाली अन्तःक्रियात्मक है ही नहीं. हम लोग छात्रों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित नहीं करते हैं? या करना नहीं चाहते है, या फिर प्रेरित ही नहीं कर पाते हैं. कुछ साथी तो यह कहने में भी कोई गुरेज़ नहीं करते कि ‘अरे छोड़िये भी, एक दो नहीं, पूरा अबा का अबा ही ख़राब है.’ लेकिन ऐसा कोई सैद्धांतिक किस्म का वक्तव्य देने से पहले हमें थोडा इस बात पर भी गौर कर लेना चाहिए कि जिस तरह के और जिस ज्ञानात्मक क्षमता के विद्यार्थी आ रहे हैं वही तो हमारा सरमाया है. हमें उन्हीं पर मेहनत  करनी है. हमारे साथी प्राध्यापक अक्सर विद्यार्थी के सुविज्ञ न होने की शिकायत करते हैं. सुधार के उपायों पर विचार नहीं करते.
जबकि वे स्वयं कितने विज्ञ हैं इस विषय में कोई नहीं सोचता. जहाँ अध्यापक बनते ही हममें से ज़्यादातर साथी सबसे पहला काम करते हें पढ़ना-लिखना छोड़ देना. लिखना चाहे जारी भी रखें पर पढ़ने के द्वार तो लगभग बंद कर ही लेते हैं. आज जब रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी या रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ आदि सरीखे  प्राध्यापक ही नहीं हैं तो उनके योग्य शिष्यों जैसे विद्यार्थियों की अपेक्षा कैसे की जा सकती है. समस्या लगभग सभी विश्वविद्यालयों में ऐसी ही हैं। इसका एक कारण तो यह है कि बहुत से शिक्षक अपनी जिम्मेदारी के प्रति उदासीन हैं। दूसरे, नौकरी पाते ही शिक्षक पहला काम यह करता है कि स्वयं को सर्वज्ञ और सर्वगुण संपन्न समझ करके यह भूल जाना चाहता है कि वह भी कभी छात्र था। जैसे रेल के डिब्बे में सीट पा चुका मुसाफिर अपनी ओर से तो पूरा प्रयास यही करता है कि ट्रेन किसी भी स्टेशन पर न रुके। अगर रुके भी तो कोई अन्य सवारी उस डिब्बे में न चढ़े और यदि  सवारी जोर लगाकर चढ़ भी जाये तो उस मुसाफिर की ओर तो बिलकुल भी न देखे जो डिब्बे में पहले से बैठा हुआ है और सीट पाकर निश्चिन्त है. ट्रेन में सवार यात्री का बस चले तो वह पूरी ट्रेन को लेकर अकेला ही गंतव्य तक चला जाय। यह तो इस आपाधापी के दौर की सोच है. लगभग यही हालत उन साथी अध्यापकों की भी है जो शोध कर चुके हैं,  नौकरी पा चुके हैं, प्रमोशन ले चुके हैं और विश्वविद्यालयों अथवा महाविद्यालयों में, जहां कहीं भी शोध-कार्य होता है, ज़िम्मेदारी के पदों पर हैं। अब वे स्वयं को ऐसी स्थिति में पहुंचा हुआ मानते हैं कि जब उनसे मिलिए तो जैसे कह रहे हों कि आओ बेटा आओ, हम कराएँगे अनुसन्धान और बताएँगे कि कैसे होती है शोध. पहले तो ऐसा प्रश्न-पत्र बनाया जाता है जिसे उसी अध्यापक से पूछ लिया जाये तो वे स्वयं भी हल न कर सकें। क्योंकि कठिन से कठिन प्रश्नपत्र बनाना ही उनकी सफलता का प्रमाण होता है। फिर यदि कोई प्रतिभाशाली छात्र लिखित परीक्षा में पास हो भी गया तो फिर साक्षात्कार में - जिसे कोई और घटिया नाम दे दिया जाय तो बेहतर- छात्र के ज्ञान और उसके शोध-विषय की इतनी छीछालेदर कर डालते हैं कि विद्यार्थी परेशान होकर कुछ ऐसा-वैसा नहीं कर गुज़रता यही क्या कम ग़नीमत है। आप चाहें तो नमूने के लिए कुछ प्रश्न आपके विचारार्थ प्रस्तुत हैं -1.  शार्दूलविक्रीड़ित छंद क्या होता है, सोदाहरण समझाइये?, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के इतिहास-ग्रंथों में किसके इतिहास की टीआरपी ज़्यादा है और क्यों? बच्चन सिंह की पुस्तक 'हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास' को हिन्दी साहित्य का तीसरा या चौथा इतिहास क्यों नहीं कह सकते। आदि आदि। इसी प्रकार के और भी भयानक किस्म के हतोत्साहित कर देने वाले परमाणु हथियार जैसी मारक क्षमता से लैस अनेक सवाल। मैं बात को हल्का करने का प्रयास बिल्कुल भी नहीं कर रहा हूं। आप अपने अनुभवों के आलोक में स्वयं विचार करें तो पाएंगे कि कई बार साथी लोग विद्यार्थी के साथ कुछ इस तरह का वर्ताव करते हैं कि जैसे दुश्मन की सेना का भटका हुआ कोई सैनिक आ फंसा हो। साथी उसको इस तरह देखते हैं और सोचते हैं कि अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे. जैसे विद्यार्थी सचमुच ऊंट ही है और हम स्वयं पहाड़. दरअसल होना तो यह चाहिए कि हम अपनी सोच में बदलाव लाने का प्रयास करें. विद्यार्थी को अपने स्तर से ही नहीं बल्कि उसके स्तर से भी जांचने की आवश्यकता है. आज ज़रुरत इस बात की है कि छात्र को हम कम से कम छात्र समझें और अपना ही छात्र समझें।